01 अगस्त, 2012

ब्लैक आउट....पावर ग्रिड फेल


 ब्लैक आउट....पावर ग्रिड फेल

एक साथ  तीन ग्रिड फेल, २१ राज्यों की बिजली गुल ......

विवेक रंजन श्रीवास्तव
पावर इंजीनियर व जनसंपर्क अधिकारी
म. प्र.पूर्वी क्षेत्र  विद्युत वितरण कंपनी , जबलपुर
मो ०९४२५८०६२५२

उत्तरी ग्रिड फेल होने के बाद इसे दुरुस्त हुए २४ घंटे भी नहीं बीते कि देश में फिर एक बार बिजली आपूर्ति की अभूतपूर्व समस्या पैदा हो गई। मंगलवार दोपहर करीब एक बजे एक साथ उत्तरी, उत्तर-पूर्वी तथा पूर्वी ग्रिड में खराबी आ गई। दुनिया के इस सबसे बड़ा ब्लैक आऊट में देश ६७ करोड़ लोग प्रभावित हुए। इससे पहले २००२ में पश्चिमी ग्रिड में ऐसे ही ओवर ड्रा के कारण म. प्र. व अन्य राज्यो में बिजली गुल हुई थी , पर तब से अनुशासित बिजली ड्र के चलते इस बार पस्चिमी ग्रिड इस अभूतपूर्व संकट से बचा रहा . देश में बिजली पारेषण के लिए कुल पाँच - उत्तरी, पूर्वी, उत्तर-पूर्वी, दक्षिणी तथा पश्चिमी ग्रिड हैं। इनमें से दक्षिणी ग्रिड को छोड़कर सभी आपस में जुड़े हैं। इन सभी ग्रिडों का संचालन पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन करता है। इसके पास ९५,००० सर्किट किमी की पारेषण लाइन है।

कैसे होता है पावर ग्रिड फेल ?

बिजली का व्यवसायिक संग्रहण अब तक अनुसंधान का विषय है , केमिकल इनर्जी के रूप में केवल सैल , बैटरी आदि में ही कुछ बिजली संग्रहित की जा सकती है . बड़े पैमाने पर बिजली  उत्पादित होती है , परिवहन की जाती है और तुरंत उसकी खपत भी हो जाती है .इलेक्ट्रानिक  इंस्ट्रूमेंटेशन तथा मंहगे पावर व्हीलिंग उपकरणो को अधिक वोल्टेज के कारण जलने से बचाने के लिये पावर ग्रिड में आटो ट्रिपिंग की व्यवस्था की गई हैं . हमारा विद्युत सिस्टम ४९.२ से ५०.२ हर्टज की बिजली  के लिये डिजाइन किया गया है . इन सीमाओ से कम या ज्यादा फ्रीक्वेंसी होने पर सेंसेटिव इलेक्ट्रानिक उपकरण आटो ट्रिपिंग के जरिये विद्युत प्रवाह बाधित कर देते हैं .समूचा पावर ग्रिड परस्पर जुड़ा हुआ है . सातो दिन २४ घंटे लोड वितरण केंद्रो पर तैनात इंजीनियर विद्युत प्रवाह पर नजर रखते हैं तथा खपत व उत्पादन में सामंजस्य बनाये रखकर प्रवाहित हो रही विद्युत फ्रीक्वेंसी को परमिसिबल लिमिट में बनाये रखते हैं . यदि अचानक उत्पादन से मांग बढ़ जावे तो फ्रीक्वेंसी कम हो जाती है तथा यदि अचानक उत्पादन बढ़ जावे और साथ ही मांग न बढ़े तो फ्रीक्वेंसी अधिक हो जाती है . दोनो ही स्थितियो में सिस्टम फेल होने की परिस्थिती बनती है . अचानक आई तकनीकी या विद्युत उपकरण की खराबी भी इसके लिये जिम्मेदार हो सकती है , किन्तु उसकी संभावना इसलिये नगण्य होती है क्योकि दुनियां भर में मशहूर हमारे इंजीनियर निर्धारित मापदण्डो के अनुरूप  रखरखाव में कोई कोताही नही बरतते .
दूसरी ओर इस समय हर राज्य में बिजली की समस्या राजनैतिक अस्त्र बन चुकी है .मांग अधिक है उपलब्धता कम . नतीजा यह होता है कि राज्यो को ओवरड्रा करना पड़ता है . ओवर ड्रा हेतु निर्धारित पैनाल्टी , निजी विद्युत संयंत्रो से खरीदी जाने वाली बिजली की कीमत से कम है , अतः स्वाभाविक रूप से सस्ते विकल्प की ओर बढ़कर राज्यो की विद्युत वितरण इकाईयां  आपूर्ति करती दिखती हैं . इसमें अनुशासन बहुत जरूरी है .


३१ जुलाई २०१२ का बिजली संकट ...ओवरड्रॉ

पंजाब सरकार का कहना है कि जब ग्रिड फेल हुई उस समय राज्य स्वीकृत लोड से महज १.२ फीसद ज्यादा बिजली ले रहा था, जबकि हरियाणा में २२.४ फीसद और उप्र में ६.४ फीसद ओवरड्रॉ हो रही थी। हालाँकि उप्र का कहना है कि मानकों के आधार पर ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि उसकी गतिविधियों की वजह से ग्रिड फेल हुई।
कुल २० राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में बिजली गुल हो गई। रेल, मेट्रो तथा अन्य आवश्यक सेवाएँ बाधित हो गईं। दस राज्यों में रेलवे के सात जोन में ३०० ट्रेनों का परिचालन बाधित हुआ। पश्चिम बंगाल में तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सरकारी दफ्तरों में छुट्टी घोषित कर दी। बाद में तीन बजे तक करीब साठ फीसद आपूर्ति बहाल होने का दावा किया गया, जिससे दिल्ली मेट्रो समेत कुछ रूटों पर रेल सेवाएँ चालू हो सकीं। आधिकारिक सूत्रों ने स्थिति सामान्य होने में ८ से १२ घंटे का समय लगने की बात कही है। बिजली मंत्रालय के अधीन कार्यरत नेशनल लोड डिस्पैच सेंटर (एनएलडीसी) ने एक अपडेट में कहा है- ग्रिड में करीब एक बजे खराबी आई, जिसका असर उत्तरी, पूर्वी तथा उत्तर-पूर्वी ग्रिड पर हुआ। शेष-पेज ९ इस बिजली संकट से संप्रग सरकार ने देश के ६० करोड़ लोगों को अंधेरे में धकेला है।

पश्चिमी ग्रिड का अनुशासन काम आया

तीन ग्रिड बंद होने के बाद वेस्टर्न ग्रिड से जुड़े मध्यप्रदेश में भी बिजली आपूर्ति ठप होने का खतरा बढ़ गया था। लोड डिस्पैच सेंटर के अधिकारियों की तत्परता ने न केवल प्रदेश को बचाया बल्कि पूरे वेस्टर्न ग्रिड को फेल होने से भी बचा लिया। सूत्रों के मुताबिक तीनों ग्रिड बंद होने के साथ प्रदेश में बिजली की फ्रीक्वेंसी ५१.४५ हर्ट्ज तक पहुंच गई थी जबकि सामान्य बिजली की फ्रीक्वेंसी ५० हर्ट्ज रहती है। बदले हालात से निपटने के लिए अधिकारियों ने इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर, बरगी, बिरसिंहपुर हाइडल प्लांट, टोंस का एक तिहाई बिजली उत्पादन बंद करा दिया था। इससे लगभग ३५० मेगावॉट बिजली उत्पादन ग्रिड में नहीं पहुंचा। दूसरी ओर तीनों विद्युत वितरण कंपनियों के प्रबंधन से तत्काल हर गांव के लिए बिजली फीडर खुलवा दिए। जानकारों का कहना था कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि ग्रिड पर बिजली ज्यादा आ गई थी और मांग कम थी।वेस्टर्न ग्रिड बचने के पीछे बिजली की मांग कम होने के साथ इससे जुड़े राज्यों में बिजली का अनुशासित उपयोग किया जाना मुख्य कारण था। सिस्टम को उन्नत बनाने में मध्यप्रदेश में पिछले दस सालों में जो रिकार्ड काम हुए उसका भी महत्वपूर्ण स्थान रहा।

फेल होने वाली तीनों ग्रिडें ५०,००० मेगावाट बिजली का पारेषण करती हैं। ग्रिड फेल हो जाने के कारण मंगलवार को पश्चिम बंगाल और झारखंड की कई कोयला खदानों में अफरातफरी मच गई। ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) की बंगाल स्थित खानों में दो सौ से ज्यादा मजदूर भूमिगत खदानों में फँस गए। इसी प्रकार झारखंड की सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) के अंतर्गत आने वाली आधा दर्जन खदानों में भी ६५ से ज्यादा मजदूर फँस गए। कुछ घंटों की मशक्कत के बाद इन मजदूरों को सुरक्षित निकाला जा सका।

ऐसे राष्ट्रीय संकट के समय भी राजनीति और खुद का बचाव दुखद

इस अभूतपूर्व संकट के समय नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री गुजरात ने बयान दिया कि कमजोर आर्थिक प्रबंधन से संप्रग ने आम लोगों की जेबें खाली कीं, महँगाई के कारण भूखे पेट रखा और आज उन्हें अंधेरे में धकेल दिया। प्रधानमंत्री जी ६० करोड़ लोग तथा १९ राज्य अंधेरे में हैं। देश जानना चाहता है कि क्या आप यहाँ भी गठबंधन धर्म का पालन कर रहे हैं। तो शिंदे जी जो केंद्रीय उर्जा मंत्री के रूप  में कह रहे थे कि उन्हें सुबह ही इस ओवर ड्रा की रिपोर्ट दे दी गई थी "आज सुबह ही मुझे बताया गया कि पूर्वी ग्रिड से ३,००० मेगावाट ज्यादा बिजली खींची गई है। हमने निर्देश दिया है कि इसे रोका जाए या फिर उनके (ज्यादा बिजली लेने वाले राज्यों) के खिलाफ कार्रवाई की जाए। "  समझ से परे है कि दोपहर तक उस पर निर्णायक कार्यवाही क्यो नही की गई ?
यू पी के अनिल कुमार गुप्ताजो  प्रधान बिजली सचिव, हैं का बयान पढ़ने को मिला कि "जिस समय ग्रिड फेल की घटना हुई, उस समय मानकों के आधार पर उप्र में ऐसा कोई बिजली ऑपरेशन नहीं हुआ जिससे कि ऐसा हो। संदेह है कि पारेषण लाइन में गड़बड़ी के कारण यह घटना हुई। इसमें आगे जाँच की जरूरत है ताकि इसकी असली वजह का पता चल सके।" मतलब हर कोई अपनी जिम्मेदारी से बचने की ही कसरत में लगा है किसी को राष्ट्र हित और आम आदमी की तकलीफ से सीधा सरोकार नही . आम नागरिक के नाम पर यह राजनीतिक बिसात दुखद है .


भविष्य में क्या हो बचाव के उपाय ?
इस फेल्योर से दुनिया में देश की जो जग हंसाई हुई , वह दोबारा न हो , किसी आतंकी संकट की अवस्था न बने इसके लिये बहुत जरुरी है कि ऊर्जा के क्षेत्र विशेष रूप से बिजली के विषय में अनुसंधान पर जोर दिया जावे , राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक मद आबंटन हो . बिजली सुधारो के नाम पर राज्य के बिजली बोर्डो का  जो अंधाधुंध विखण्डन किया गया है , उस पर पुनर्विचार हो
बिजली , रेल और दूरदर्शन या आकाशवाणी की ही तरह राष्ट्रीय सेवा है जो समुचे देश को एक सूत्र में पिरोये रखने के लिये जरुरी है , यदि वह केवल केंद्र के अधीन हो तो इस तरह की राज्यो की अनुशासन हीनता की समस्या उत्पन्न ही न हो .

1 टिप्पणी:

  1. यह तो बिजली विभाग का घोर राजनीतिकरण और मुफ्त बिजली बांटने जैसे दुष्कर्मों का नतीजा है.

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