11 नवंबर, 2014

कटियाबाज बिजली चोरी की सामाजिक बुराई प्रदर्शित करती एक महत्वपूर्ण डाक्युमेंट्री

कटियाबाज बिजली चोरी  की सामाजिक बुराई प्रदर्शित करती  एक महत्वपूर्ण डाक्युमेंट्री


विवेक रंजन श्रीवास्तव
अधीक्षण अभियंता व जनसंपर्क अधिकारी
म. प्र. पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी जबलपुर
मो ९४२५८०६२५२ ई मेल vivek1959@yahoo.co.in

म. प्र. पावर मैनेजमेंट कम्पनी के सी एम डी श्री मनु श्रीवास्तव आई ए एस के इनीशियेटिव पर , विद्युत मण्डल परिसर के  तरंग प्रेक्षागृह में विगत दिवस समानांतर सिनेमा और फीचर फिल्मो को चुनौती देती   'कटियाबाज' नाम की एक डॉक्यूमेंट्री विद्युत कर्मियो के लिये विशेष रूप से आयोजित शो में प्रदर्शित की गई । इस अवसर पर फिल्म के सह निर्देशक श्री फहद मुस्तफा विशेष रूप से उपस्थित रहे , जिन्होने शो के उपरांत दर्शको से विस्तृत संवाद भी किया तथा कटियाबाज को लेकर अपने अनुभव साझा किये .  दीप्ति कक्कड़ भी इस फिल्म की सह निर्देशिका हैं . कटियाबाज का अर्थ होता है  वे लोग जो बिजली लाइन पर तार फंसाकर बिजली चोरी करते हैं। इस सामाजिक बुराई से बिल भरने वाले नियम पसंद उपभोक्ताओ पर व्यर्थ बिजली बिलो का भार बढ़ता है , तथा बिजली कंपनियो का घाटा बढ़ता जा रहा है .
इस महत्वपूर्ण समस्या पर निर्मित यह पहली बड़ी फिल्म है .

इससे पहले भी कुछ फिल्मो के कुछ अंश बिजली से संबंधित विषयो पर संदेश देने वाले रहे हैं जैसे 
विवाह समारोहो में बिजली चोरी के खिलाफ संदेशा .. फिल्म बैंड बाजा बारात में ...दिया गया है .
.शादी विवाह , अन्य सार्वजनिक , धार्मिक  समारोहो में बिना बिजली का नियमित कनेक्शन लिये हुये खंभे से सीधे तार जोड़कर बिजली ले लेना जैसे हमारे यहाँ अधिकार ही माना जाने लगा है ...  इस बिजली चोरी के विरुद्ध बैंड बाजा बारात में फिल्म की हीरोइन अनुष्का शर्मा एक डायलाग में संदेश  देती हैं तथा इसे गलत ठहराती हैं . ... भई वाह ! लेखक , निर्देशक को भी बधाई !

अनुष्का शर्मा की पिछली फिल्म "रब ने बना दी जोडी" में भी शाहरूख खान का " पंजाब पावर लाइटनिंग योर लाइफ्स " वाला डायलाग भी बिजली सैक्टर के लोगो के लिये इंस्पायरिंग था .

'स्वदेश' फिल्म में शाहरुख खान को हमने बिजली तैयार करते देखा । जम्मू में किश्तवाड़ का गुलाबगढ़ इलाका , यहां इस फिल्म को देखकर प्रेरणा ली ध्यान सिंह और जोगिन्दर ने तथा खराब चक्की से बनाया पनबिजली यंत्र और बना ली बिजली . जम्मू से ३०० किमी दूर  गुलाबगढ़ के चशोती गांव में यह  प्रयोग कर दिखाया .आसपास 20 किमी तक कोई बसाहट नहीं। सड़क भी नहीं। करीब 22 हजार की आबादी बिजली न होने से अंधेरे में रहती है। लेकिन यहां के दो युवा रोशनी ले आए हैं। उन्होंने घर के पास से गुजरने वाली पहाड़ी नदी की धारा से बिजली बना ली। घर में खराब पड़ी चक्की में डेढ़ वर्ष पहले डायनामो लगाया और उसी से बिजली तैयार की। इस परिवार ने घर के अलावा मंदिर में बिजली दी हुई है। घर में डिश टीवी समेत इलैक्ट्रानिक सामान का खूब इस्तेमाल करते हैं।


'कटियाबाज' कहानी है कानपुर की, जहां किसी जमाने में चार सौ कारखाने होते थे, लेकिन अब बिजली की किल्लत के कारण करीब दो सौ कारखाने ही बचे हैं। इस डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया है कि कैसे 15 से 18 घंटे बिजली गुल होने की वजह से लोग बेहाल हैं। 'कटियाबाज' में बिजली चोर और उसके उपभोक्ता दोनों ही गरिमा और बिजली के साथ जीने के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं।

इस फिल्म का मुख्य किरदार है लोहा सिंह, जो शहर का मशहूर कटियाबाज है। लोहा सिंह लोगों के लिए बिजली की तारों पर कटिया डालता है और यह काम वह फख्र से करता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह बिजली से बेहाल लोगों की मदद कर रहा है।

दीवालिया हो चुकी सरकारी बिजली कंपनी में एक योग्य महिला अधिकारी काम संभालती हैं, जिनका नाम है ऋतु महेश्वरी। उल्लेखनीय है कि ऋतु महेश्वरी का किरदार वास्तविक है , वे उ. प्र. की आई ए एस अधिकारी हैं . वे  उपभोक्ताओं को समय पर बिजली बिलों का भुगतान करने को कहती हैं, साथ ही बिजली चोरों के खिलाफ एक अभियान भी शुरू करती हैं, पर लोगों की नजरों में वह विलेन बन जाती हैं।

इस फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि यह डॉक्यूमेंट्री होते हुए भी आपको फिल्म का मजा देगी। जो लोग छोटे शहरों में रहते हैं या फिर उन गांव या शहरों में जहां बिजली के नाम पर सिर्फ तार और खंभा हैं, तथा जो बिजली कंपनियो में कार्यरत है , वे खुद को इस फिल्म से बखूबी जोड़ पाते हैं । इस फिल्म में इमोशन है, ड्रामा है, एक्शन है और इंटरटेनमेंट भी। यहां हीरो भी है, विलेन भी और नेता भी।

ये डॉक्यूमेंट्री देखकर आप अंदाजा लगा पाएंगे कि उन शहरों की हालत कैसी होती है, जहां बिजली न के बराबर आती है और कैसे सिस्टम में फंसकर मुद्दा धरा का धरा रह जाता है। फिल्म में ऋतु महेश्वरी का एक डायलॉग है कि पहली बार ऐसा हुआ है कि उनका तबादला नहीं किया गया और उनके बेटे ने एक ही शहर में रहकर अपनी क्लास का सालाना इम्तिहान पास किया है। यह डायलॉग दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर सकता है कि आखिर इस परिस्थिति का जिम्मेदार कौन है और कैसे जनता, राजनेता और नौकरशाह अपनी-अपनी लड़ाइयां लड़ रहे हैं, पर यह ऐसी लड़ाई है जिसमें सही मायने में जीत किसी की नहीं होती।

डॉक्यूमेंट्री में बैकग्राउंड स्कोर जरा फिल्मी रखा गया है। सबसे अच्छी बात यह कि फिल्म एकतरफा नहीं है। इस परिस्थिति से जूझने वाले हर शख्स के पहलू इसमें रखे गए हैं। यह फिल्म किसी एक शख्स पर नहीं, बल्कि बिजली चोरी की समस्या पर अंगुली उठाती है।
कहानी को थोड़ा और ढंग से बांधा जा सकता था, जैसे कि कई जगहों पर घटनाक्रम या सीन्स बिखरे हुए लगे। अगर कहानी परत दर परत खुलती, तो और बेहतर होता, कथानक का अंत भी बेहतर बनाया जा सकता था , जिससे बिजली चोरी के विरुद्ध एक प्रतिबद्धता व संदेश दिया जा सकता था . वास्तविकता के चित्रांकन के चक्कर में फिल्म में कई अश्लील संवाद कानो में गड़ते हैं .  लेकिन निर्देशकों ने एक डॉक्यूमेंट्री को भी रोचक बनाकर शानदार काम किया है।

यद्यपि यह सुखद हे कि म.प्र. में अटल ज्योति अभियान के बाद से आम उपभोक्ताओ को अनवरत २४ घंटो बिजली मिल रही है .

14 सितंबर, 2014

इंजीनियर्स डे १५ सितम्बर ....भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया के जन्म दिवस पर

इंजीनियर्स डे १५ सितम्बर

भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया के जन्म दिवस पर

विवेक रंजन श्रीवास्तव
अधीक्षण अभियंता सिविल
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर जबलपुर
४८२००८
मो ९४२५४८४४५२


        आज अमेरिका में सिलिकान वैली में तब तक कोई कंपनी सफल नही मानी जाती जब तक उसमें कोई भारतीय इंजीनियर कार्यरत न हो ....,भारत के आई आई टी जैसे संस्थानो के इंजीनियर्स ने विश्व में अपनी बुद्धि से भारतीय श्रेष्ठता का समीकरण अपने पक्ष में कर दिखाया है . प्रतिवर्ष भारत रत्न सर मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया का जन्मदिवस इंजीनियर्स डे के रूप में मनाया जाता है . पंडित नेहरू ने कल कारखानो को नये भारत के तीर्थ कहा था , इन्ही तीर्थौ के पुजारी , निर्माता इंजीनियर्स को आज अभियंता दिवस पर बधाई ....विगत कुछ दशको में इंजीनियर्स की छबि में भ्रष्टाचार के घोलमाल में बढ़ोत्री हुई है , अनेक इंजीनियर्स प्रशासनिक अधिकारी या मैनेजमेंट की उच्च शिक्षा लेकर बड़े मैनेजर बन गये हैं , आइये आज इंजीनियर्स डे पर कुछ पल चिंतन करे समाज में इंजीनियर्स की इस दशा पर , हो रहे इन परिवर्तनो पर ... इंजीनियर्स अब राजनेताओ के इशारो चलने वाली कठपुतली नही हो गये हैं क्या? देश में आज इंजीनियरिंग शिक्षा के हजारो कालेज खुल गये हैं , लाखो इंजीनियर्स प्रति वर्ष निकल रहे हैं , पर उनमें से कितनो में वह जज्बा है जो भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया में था .......मनन चिंतन का विषय है .

भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया की जीवनी

        भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर 1860 को हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। पिता संस्कृत के विद्वान थे। विश्वेश्वरैया ने प्रारंभिक शिक्षा जन्म स्थान से ही पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बंगलूर के सेंट्रल कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन यहां उनके पास धन का अभाव था। अत: उन्हें टयूशन करना पड़ा। विश्वेश्वरैया ने 1881 में बीए की परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया। इसके बाद मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। 1883 की एलसीई व एफसीई (वर्तमान समय की बीई उपाधि) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके अपनी योग्यता का परिचय दिया। इसी उपलब्धि के चलते महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया।

        दक्षिण भारत के मैसूर, कर्र्नाटक को एक विकसित एवं समृद्धशाली क्षेत्र बनाने में भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया का अभूतपूर्व योगदान है। तकरीबन 55 वर्ष पहले जब देश स्वंतत्र नहीं था, तब कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर समेत अन्य कई महान उपलब्धियां एमवी ने कड़े प्रयास से ही संभव हो पाई। इसीलिए इन्हें कर्नाटक का भगीरथ भी कहते हैं। जब वह केवल 32 वर्ष के थे, उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी की पूर्ति भेजने का प्लान तैयार किया जो सभी इंजीनियरों को पसंद आया। सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिए समिति बनाई। इसके लिए भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया ने एक नए ब्लॉक सिस्टम को ईजाद किया। उन्होंने स्टील के दरवाजे बनाए जो कि बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करता था। उनके इस सिस्टम की प्रशंसा ब्रिटिश अधिकारियों ने मुक्तकंठ से की। आज यह प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है। विश्वेश्वरैया ने मूसा व इसा नामक दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी प्लान तैयार किए। इसके बाद उन्हें मैसूर का चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया।

        उस वक्तराज्य की हालत काफी बदतर थी। विश्वेश्वरैया लोगों की आधारभूत समस्याओं जैसे अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी आदि को लेकर भी चिंतित थे। फैक्टरियों का अभाव, सिंचाई के लिए वर्षा जल पर निर्भरता तथा खेती के पारंपरिक साधनों के प्रयोग के कारण समस्याएं जस की तस थीं। इन समस्याओं के समाधान के लिए विश्वेश्वरैया ने इकॉनोमिक कॉन्फ्रेंस के गठन का सुझाव दिया। मैसूर के कृष्ण राजसागर बांध का निर्माण कराया। कृष्णराजसागर बांध के निर्माण के दौरान देश में सीमेंट नहीं बनता था, इसके लिए इंजीनियरों ने मोर्टार तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था। 1912 में विश्वेश्वरैया को मैसूर के महाराजा ने दीवान यानी मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया।
विश्वेश्वरैया शिक्षा की महत्ता को भलीभांति समझते थे। लोगों की गरीबी व कठिनाइयों का मुख्य कारण वह अशिक्षा को मानते थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में मैसूर राज्य में स्कूलों की संख्या को 4,500 से बढ़ाकर 10,500 कर दिया। इसके साथ ही विद्यार्थियों की संख्या भी 1,40,000 से 3,66,000 तक पहुंच गई। मैसूर में लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल तथा पहला फ‌र्स्ट ग्रेड कॉलेज (महारानी कॉलेज) खुलवाने का श्रेय भी विश्वेश्वरैया को ही जाता है। उन दिनों मैसूर के सभी कॉलेज मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध थे। उनके ही अथक प्रयासों के चलते मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई जो देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है। इसके अलावा उन्होंने श्रेष्ठ छात्रों को अध्ययन करने के लिए विदेश जाने हेतु छात्रवृत्ति की भी व्यवस्था की। उन्होंने कई कृषि, इंजीनियरिंग व औद्योगिक कालेजों को भी खुलवाया।
        वह उद्योग को देश की जान मानते थे, इसीलिए उन्होंने पहले से मौजूद उद्योगों जैसे सिल्क, संदल, मेटल, स्टील आदि को जापान व इटली के विशेषज्ञों की मदद से और अधिक विकसित किया। धन की जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने बैंक ऑफ मैसूर खुलवाया। इस धन का उपयोग उद्योग-धंधों को विकसित करने में किया जाने लगा। 1918 में विश्वेश्वरैया दीवान पद से सेवानिवृत्त हो गए। औरों से अलग विश्वेश्वरैया ने 44 वर्ष तक और सक्रिय रहकर देश की सेवा की। सेवानिवृत्ति के दस वर्ष बाद भद्रा नदी में बाढ़ आ जाने से भद्रावती स्टील फैक्ट्री बंद हो गई। फैक्ट्री के जनरल मैनेजर जो एक अमेरिकन थे, ने स्थिति बहाल होने में छह महीने का वक्त मांगा। जोकि विश्वेश्वरैया को बहुत अधिक लगा। उन्होंने उस व्यक्ति को तुरंत हटाकर भारतीय इंजीनियरों को प्रशिक्षित कर तमाम विदेशी इंजीनियरों की जगह नियुक्त कर दिया। मैसूर में ऑटोमोबाइल तथा एयरक्राफ्ट फैक्टरी की शुरूआत करने का सपना मन में संजोए विश्वेश्वरैया ने 1935 में इस दिशा में कार्य शुरू किया। बंगलूर स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स तथा मुंबई की प्रीमियर ऑटोमोबाइल फैक्टरी उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। 1947 में वह आल इंडिया मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। उड़ीसा की नदियों की बाढ़ की समस्या से निजात पाने के लिए उन्होंने एक रिपोर्ट पेश की। इसी रिपोर्ट के आधार पर हीराकुंड तथा अन्य कई बांधों का निर्माण हुआ।
        वह किसी भी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने में विश्वास करते थे। 1928 में पहली बार रूस ने इस बात की महत्ता को समझते हुए प्रथम पंचवर्षीय योजना तैयार की थी। लेकिन विश्वेश्वरैया ने आठ वर्ष पहले ही 1920 में अपनी किताब रिकंस्ट्रक्टिंग इंडिया में इस तथ्य पर जोर दिया था। इसके अलावा 1935 में प्लान्ड इकॉनामी फॉर इंडिया भी लिखी। मजे की बात यह है कि 98 वर्ष की उम्र में भी वह प्लानिंग पर एक किताब लिख रहे थे। देश की सेवा ही विश्वेश्वरैया की तपस्या थी। 1955 में उनकी अभूतपूर्व तथा जनहितकारी उपलब्धियों के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। जब वह 100 वर्ष के हुए तो भारत सरकार ने डाक टिकट जारी कर उनके सम्मान को और बढ़ाया। 101 वर्ष की दीर्घायु में 14 अप्रैल 1962 को उनका स्वर्गवास हो गया। 1952 में वह पटना गंगा नदी पर पुल निर्माण की योजना के संबंध में गए। उस समय उनकी आयु 92 थी। तपती धूप थी और साइट पर कार से जाना संभव नहीं था। इसके बावजूद वह साइट पर पैदल ही गए और लोगों को हैरत में डाल दिया। विश्वेश्वरैया ईमानदारी, त्याग, मेहनत इत्यादि जैसे सद्गुणों से संपन्न थे। उनका कहना था, कार्य जो भी हो लेकिन वह इस ढंग से किया गया हो कि वह दूसरों के कार्य से श्रेष्ठ हो।
उनकी जीवनी हमारे लिये प्रेरणा है

13 सितंबर, 2014

कार्पोरेट जगत , युवा वर्ग और राष्ट्र भाषा हिन्दी


आलेख
कार्पोरेट जगत ,  युवा वर्ग और राष्ट्र भाषा हिन्दी 

विवेक रंजन  श्रीवास्तव ‘विनम्र
अतिरिक्त अधीक्षण इंजीनियर
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर (मप्र) 482008
मो. 9425806252

हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है, पर प्रश्न है कि क्या सचमुच ही हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा बन पाई है ? इस यक्ष प्रश्न को अनुत्तरित छोड देने में विगत पीढी के उन राजनेताओं की बहुत बडी गलती है, जिसके अनुसार हमारी संसद ने यह विधेयक पारित कर दिया कि जब तक देश का एक भी राज्य हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार करने में अपनी तैयारी या अन्य कारणो से असमर्थता व्यक्त करें, तब तक हिंदी को अनिवार्य नहीं किया जावेगा। यही कारण है कि क्षेत्रवाद, भाषाई राजनीति, पक्ष, विपक्ष के चलते कानूनी रूप से हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा के रूप में आजादी के पैसठ वर्षों बाद भी स्थापित नहीं हो पाई।
लोकतंत्र में कानून से उपर जन भावनायें होती है, विगत कुछ दशकों में बाजारवाद विश्व पर हावी हुआ है आज का युवावर्ग इसी बाजारवाद से प्रभावित है, जहां आजादी के दिनों में उत्सर्ग, देश के लिये समर्पण और त्याग की भावनायें युवाओं को आकृष्ट कर रही थी, वहीं वर्तमान समय में स्वंय की आर्थिक उन्नति, बढती आबादी के दबाव के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा में येन केन प्रकारेण आगे निकलने की होड में युवा सतत व्यस्त है। आज कार्पोरेट जगत में युवा शक्ति का साम्राज्य है . विभिन्न कंपनियो के शिर्ष पदो पर अधिकांशतः युवा ही पदारूढ़ हैं . बाजार वैश्विक हो चला है . अंग्रेजी वैश्विक संपर्क भाषा के रूप में स्थापित  हो चुकी है, अतः आज युवावर्ग ने मातृभाषा हिन्दी की अपेक्षा अंग्रेजी को प्राथमिकता देते हुये अपनी अभिव्यक्ति व संपर्क का माध्यम बनाया है, त्रिभाषा फार्मूले के शीर्ष पर अंग्रेजी स्थापित होती दिख रही है। आंकडो में देखे तो हिन्दी का विस्तार हो रहा है, नई पत्र पत्रिकायें, किताबें, हिन्दी बोलने वालो की संख्या, विश्वविद्यालयों में हिन्दी पाठ्यक्रम ,  सब कुछ बढ रहा है। पर वास्तविकता से परिचित होने की जरूरत है, जर्मन रेडियो डायचेवेली ने हिन्दी प्रसारण बंद कर दिया है। बीबीसी अपने हिन्दी प्रसारण अप्रैल 2011 से बंद करने वाला है। हिंदी पुस्तको के प्रथम संस्करणों में 200 से 250 प्रतियां ही छप रही है। हिंदी लेखकों को कोई उल्लेखनीय रायल्टी नहीं मिल रही है। हिदीं ‘हिन्गलिश‘ बन रही है। मोबाईल पर एस.एम.एस हो या नेटवर्किग साइट पर युवा वर्ग की चैटिंग, रेडियो जाकी की एफ.एम. रेडियो पर उद्घोषणायें  हो या टीवी के युवाओ में लोकप्रिय कार्यक्रम, शुद्ध हिंदी मिलना दुष्कर है.गांव गांव तक हमारी फिल्मो व फिल्मी गीतो का युवा वर्ग पर विशेष प्रभाव है , अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी शीर्षक की फिल्में , उनके डायलाग तथा हिन्दी व्याकरण को ठेंगा बताती शब्दावली के फिल्मी गीत अपनी तेज संगीत वाली धुनो के कारण युवाओ में लोकप्रिय हैं . आशा की किरण यही है कि यह सब जो कुछ भी है देवनागरी में है , सकारात्मक ढ़ंग से देखें तो इस तरह भी हिन्दी देश को जोड़  रही है, तथा विश्व में हिन्दी को स्थान भी दिला रही हैं .कार्पोरेट जगत के एम बी ए पढ़े लिखे युवा भले ही अंग्रेजी में गिटर पिटर करें या कार्पोरेट जगत का आंतरिक पत्र व्यवहार , प्रगति प्रतिवेदन आदि भले ही अंग्रेजी में हो पर जब वे अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करते हैं तो  उन्हें विज्ञापनो में हिन्दी का ही  सहारा लेना पड़ता है , यह और बात है कि यह हिन्दी भी विशुद्ध न होकर जन बोलौ  ही होती है. 
 हिंदी कविताओं की पुस्तके छपती है, पर वे विजिटिंग कार्ड की तरह बांटी जाने को विवश है, एवं लेखकीय आत्ममुग्धता से अधिक नहीं है। युगांतकारी रचना धार्मिता का युवा हिन्दी लेखको, कवियो में अभाव दिख रहा है। देश की आजादी के समय मिशन स्कूल, पब्लिक स्कूल एवं कावेंट स्कूलो के पास जो संस्थागत ताकत शिक्षण के क्षेत्र में थी, उसका हिंदी के विपरीत समाज पर स्पष्ट दुष्प्रभाव अब परिलक्षित हो रहा है । शिक्षा, रोजगार का साधन बनी, व्यक्ति की संस्कारों या सच्चे ज्ञान की वाहक अपेक्षाकृत कम रह गयी . रोजगार तथा बच्चो के सुखद आर्थिक भविष्य के  दृष्टिकोण से स्वंय हिन्दी के समर्थक पालको ने भी अपने बच्चो को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने में ही भलाई समझी इसके परिणाम स्वरूप आज की अंग्रेजी माध्यम से पढी पीढी सत्रह, इकतीस या उननचास नहीं समझ पाती, उसे सेवेनटीन, थर्टीवन और फोर्टीनाइन बतलाना पडता है , यह पीढ़ी अंग्रेजी में सोचकर भले ही हिंदी में लिख ले पर वह हिन्दी के संस्कारो से जुड़ नही पाई है . 
किंतु सब कुछ निराशाजनक ही नहीं है, एटीएम मशीन हो, या कम्पयूटर के साफ्टवेयर अंग्रेजी के साथ हिंदी के विकल्प भी अब  सुलभ है, हिंदी शिक्षण हेतु नेट पर कक्षायें भी चल रही है, हिंदी ब्लाग प्रजातंत्र के पांचवे स्तंभ के रूप में स्थापित हो चला है,नित नये हिन्दी ब्लाग्स विविध विषयो पर देखने को मिल रहे हैं .  यह सब हमारा युवा वर्ग ही कर रहा है, हिंदी में शोध करने वाले आज भी गंभीर कार्य कर रहे है, इसके दीर्घकालिक प्रभाव देखने को जरूर मिलेगें। आने वाले समय में आज का युवा ही हिंदी को किसी कानून के कारण नहीं, या उपर से थोपे स्वरूप में नहीं वरन् स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के बीच , अंतरमन से हिंदी की सरलता, सहजता के कारण तथा हिन्दी के भातर की जनभाषा होने के कारण  व्यापक स्वरूप में अपनायेगा, हमारी पीढी इसी आशा और विश्वास के साथ हिंदी को बढ़ता देखना चाहती है।

vivek ranjan shrivastava

10 अप्रैल, 2014

अविच्छेदित धारा विद्युत ....बिजली वितरण प्रणाली में क्रांति का सूत्रपात

अविच्छेदित धारा विद्युत ....बिजली वितरण प्रणाली में क्रांति का सूत्रपात
विवेक रंजन श्रीवास्तव
अधीक्षण इंजीनियर
म. प्र. पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी
ओ बी ११ . रामपुर , जबलपुर म. प्र.
मो ०९४२५८०६२५२

         देश में बिजली की कमी के चलते पिछले वर्षो में घंटो का पावर कट बहुत आम हो गया है . बिजली की समस्या पर चुनाव लड़े जा रहे हैं . ऐसे समय में जहाँ नीतिगत राजनैतिक निर्णय समस्या का समाधान कर सकते हैं वहीं तकनीकी अनुसंधान भी क्रांति कारी परिवर्तन ला सकता है . बिजली के क्षेत्र में लम्बे समय से अनुसंधान और आविष्कार पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता पर मैं लिखता आ रहा हूं . हम आज भी  पुरानी परंपरागत विद्युत वितरण प्रणाली से ही उपभोक्ताओ तक बिजली पहुंचा रहे हैं . पिछले कुछ दशको में इलेक्ट्रानिक्स ने व्यापक प्रगति की है अतः इलेक्ट्रो मेकेनिकल उपकरणो को इलेक्ट्रो इलेक्ट्रानिक उपकरणो में बदलने के लिये अनुसंधान पर व्यापक व्यय करने की जरूरत है . हमारे घरों में २२० वोल्ट पर ५० हर्टज की ए सी विद्युत से आपूर्ती की जाती है . अमेरिका सहित अन्य अनेक देशो में ११० वोल्ट पर वितरण प्रणाली बनाई गई है . घरो में जो अधिकांश उपकरण हम उपयोग करते हैं जैसे टी वी , कम्प्यूटर , साउंड सिस्टम वे वास्तव में डी सी करेंट पर लो वोल्टेज पर चलते हैं  . इन उपकरणो में प्रत्येक में इस परिवर्तन के लिये छोटे छोटे एडाप्टर , ट्रांस्फारमर लगाये जाते हैं . जिसके कारण उनमें गर्मी पैदा होती है और उससे निपटने के लिये वहां छोटा सा पंखा भी लगाना पड़ता है , यही नही समुचे उपकरण का वजन और साइज भी इस वजह से बढ़ जाता है . यदि इन उपकरणो को सीधे ही उनकी आवश्यकता के वोल्टेज पर  डी सी सप्लाई दी जावे तो इन उपकरणो का आकार बहुत छोटा हो सकता है , क्योकि मूलतः उनमें एक इलेक्ट्रानिक प्लेट ही होती है . पर इसके लिये हमें विद्युत वितरण प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन करना पड़ेगा . जिसके लिये व्यापक अनुसंधान और बड़ी इच्छा शक्ति की जरुरत है . हवाई जहाज , ट्रेन , कार बस में भी जहां केवल बैटरी से विद्युत प्रदाय होता है लाइट तथा पंखे सहित ये उपकरण हम उपयोग कर  पाते हैं , अर्थात यह किया जा सकता  है व तर्क संगत है . यही नही आज सोलर पावर के व्यापक उपयोग में जो सबसे बड़ी बाधा है वह यही है कि सोलर सैल से उत्पादित बिजली डी सी होती है और कम वोल्ट पर ही होती है . एक बात और , फोकस के जरिये हम एल ई डी बल्बो से भी प्रकाश की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं . आज तो सड़क बत्ती में भी सी एफ एल ट्यूब का प्रयोग होने ही लगा है . मतलब यह कि २२० वोल्ट पर विद्युत आपूर्ति से भले ही लाइन लास कम होने का तर्क दिया जावे पर शायद अनुसंधान यह प्रमाणित कर सकते हैं कि अब २२० वोल्ट की विद्युत आपूर्ति अप्रासंगिक हो चली है .
            आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है .पावर कट की समस्या पर काम करते हुये  आई आई टी मद्रास के प्रो. अशोक झुनझुनवाला जो प्रधानमंत्री जी के वैज्ञानिक सलाहकार भी हैं तथा श्री भास्कर राममूर्ति , कृष्णा वासुदेवन , लक्ष्मी नरसम्मा , उमा राजेश ,आर. कुमारावेल ,एम साईराम व जननी रंगराजन की टीम ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण परियोजना पर सफलता पाई है . उनकी इस परियोजना से हर घर २४ घंटे अविच्छेदित धारा विद्युत से रोशन रह सकता है . अभी यह परियोजना पायलट प्रोजेक्ट के रूप में दक्षिणी राज्यो में ली जा रही है . सदैव रोशनी की इस जादुई परियोजना का सार तत्व यह है कि जब पावर कट करना जरूरी हो तब बिजली वितरण प्रणाली में २२० की जगह अत्यंत कम  ४८ वोल्ट पर विद्युत आपूर्ति जारी रखी जावे . प्रत्येक उपयोगकर्ता अपने उपयोग स्थल पर एक विशेष उपकरण लगावेगा , जो उपकरण  इस लो वोल्ट ए सी बिजली को डी सी  में बदल देगा . उपयोग स्थल पर डी सी बिजली से चलने वाले बल्ब , पंखे इत्यादि की समानांतर फिटिंग होगी . जब वितरण ट्रांस्फारमर पावर कट हेतु २२० वोल्ट से ४८ वोल्ट में सप्लाई करेगा तो उपभोक्ता के घर पर लगा इलेक्ट्रानिक उपकरण इस परिवर्तन को पहचानकर ए सी आपूर्ति लाइन की जगह डी सी लाइन को सक्रिय कर देगा और पूरी तरह अंधेरे की जगह न्यूनतम १०० वाट के बल्ब , पंखे , मोबाइल चार्जर व अन्य घरेलू उपकरण डी सी विद्युत से चालू रखे जा सकेंगे . इस तरह "ना मामा नीक तो कनवा मामा ठीक " वाली कहावत के अनुसार अंधेरे से लड़ा जा सकेगा . प्रति उपयोगकर्ता १०० वाट की मामूली खपत को बिजली वितरण कम्पनी सहजता से एदजस्ट कर सकेगी . इसके लिये वितरण केंद्र पर बिजली वितरण कम्पनी को प्रति सबस्टेशन लगभग ३००० रुपये तथा , प्रत्येक उपभोक्ता को लगभग १००० रुपये के उपकरण लगाना होंगे . उपभोक्ता को  समानांतर डी सी लाइन की फिटिंग व डी सी से चलने वाले बल्ब पंखे आदि लगवाना पड़ेंगे . इनवर्टर का उपयोग समाप्त हो सकेगा . इसके विपरीत उपभोक्ता अपने घर पर सोलर सेल से सीधे विद्युत आपूर्ति करके कभी भी इस डी सी फिटिंग का उपयोग करके बिजली की बचत कर सकेगा . अभी यह परियोजना प्रायोगिक स्तर पर है , किन्तु स्वागतेय है , क्योकि यह सोलर सिस्टम के उपयोग को बढ़ावा देने और विद्युत आपूर्ति प्रणाली पर नये अनुसंधान को आकर्षित करती दिखती है .