13 अगस्त, 2016

Dear Brother Engineer ,
Greetings, from Vivek Ranjan Srivastava,
Friends I am from Jabalpur, Madhya Pradesh, one of the contestant for council member CIVIL of Institution of Engineers India. 
Sir , you might have read me in  any  newspaper, magazine or blog ,seen in Doordarshan ,or listen through radio. I am writing in Hindi and English on various technical topics since college days. BIJLI KA BADALTA PARIDRISHYA , AAKROSH , RAMBHAROSE, KOUA KAN LE GAYA ,HINDOSTA HAMARA ,JADOO SHIKSHA KA , MERE PRIY VYANG , are amongst  few of my published books , most of them are also available in daily hunt mobile app . I am a blogger since 2005. http://nomorepowertheft.blogspot.com is one of my technical blog . you may read my Hindi book on electrical topics of public interest here http://www.rachanakar.org/2013/05/blog-post_9985.html  .
 I was the founder President of Student chapter of Institution of Engineers at N I T Raipur, we published a yearly magazine, organized photography competition and  successfully organized  seminars.

I did my BE  civil honors  from Raipur N I T  batch of 1980 thereafter  post graduation  in Foundations from MANIT  Bhopal . Diploma in Management from IGNOU . I am BEE certified Energy Manager .From  Engineering Staff College  Hyderabad I did a short term courses on Pilferage  of Electricity .I did courses of CAD and Computer programming too. I am fellow of Institution and life member of SEEM .
I am serving in Madhya Pradesh Poorv Kshetra Vidyut Vitaran Company head of Civil wing as S E . 
I got  opportunity to prepare the project report of  Nuclear power plant being constructed in Mandla district at  Chutka  .  Bhimgdh and Chargaon jatlapur  hydro power projects , which  are contributing generation to power grid of M P , I am proud of that I made Its D P R and was associated with there construction  and now its contractual operation . I was very closely associated with the Government of M P ATAL JYOTI 24 hour power supply implementation Scheme   .
Friends , I got the privilege of getting  prestigious award for creative writing and social activities of
Madhya Pradesh Sahitya  Academy and Godfrey Phillips .

You will agree Sir , that the  dignity of Engineering community  , is fallen in general , in last few decades . It is the time to think and work to restore the importance of engineers in society as it was in days of Sir M G Vishvesvraiya .   Interaction of Institution activities and engineering students , using  public platforms , efforts to built the self confidence amongst  the  engineers  along with other majors are required. I have plans to act in this context .
 Please elect me to get a proper platform to work for it . You will find me always open , approachable  with positive attitude .I REQUEST YOU TO PLEASE VOTE AND SUPPORT ME , for this big cause  of Engineering community .

If your mobile or e-mail address is linked with your membership  in the institution then you will get opportunity to vote electronically via the website of Institution . you will be getting  user ID and password  to vote by SMS and EMAIL  in due course. Hard copy  ballot will come to you through post .
A total of 41 candidates for 5 seats, are contesting . My name is on serial number 37. If you vote by postal ballot please  Do not forget to enclose any of  signed  photo ID from prescribed list  .

I assure you Sir  that with your cooperation and support we will be able to cross  the heights for Institution , of those those days When Viceroy of India  before Independence and Priminister and Rashtrapati  of  Independent India were participating in our Functions .
Er Vivek Ranjan Srivastava

F I E 118110-2
Mo 09425806252

Please Vote and support VIVEK RANJAN SHRIVASTAVA FIE for inst of engrs civil council member

आदरणीय महोदय

जबलपुर मध्यप्रदेश से विवेक रंजन श्रीवास्तव के अभिवादन !

इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के माध्यम से  आपसे संवाद का सुअवसर मिला है .

शायद किसी पत्र , पत्रिका या ब्लाग में किसी विषय पर कभी आपने मुझे पढ़ा हो .  दूरदर्शन , आकाशवाणी , ज्ञानवाणी या किसी मंच से  देखा सुना हो . विभिन्न तकनीकी विषयो पर जनभाषा में लम्बे समय से लिख रहा हूं और राष्ट्रीय स्तर के जरनल्स  तथा व्यवसायिक पत्र पत्रिकाओ में कालेज के दिनो से ही लगातार लिखता आ रहा हूं .
बिजली का बदलता परिदृश्य , आक्रोश , रामभरोसे , कौआ कान ले गया , हिंदोस्तां हमारा , जादू शिक्षा का एवं   कविता , व्यंग , नाटक , व तकनीकी विषयो पर मेरी  पुस्तकें प्रकाशित हैं ,जो डेली हंट मोबाइल एप पर सुलभ हैं .  बिजली का बदलता परिदृश्य पुस्तक नेट पर यहाँ पढ़ें http://www.rachanakar.org/2013/05/blog-post_9985.html  . मेरे विभिन्न ब्लाग्स भी आप इंटरनेट पर पढ़ सकते हैं . बिजली चोरी के विरुद्ध  http://nomorepowertheft.blogspot.com मेरा प्रतिनिधि तकनीकी ब्लाग है .

रायपुर N I T से १९८० में बी ई सिविल आनर्स और  MANIT भोपाल से फाउंडेशन इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेडुएशन करने के बाद मैने म. प्र. विद्युत मण्डल में नौकरी प्रारंभ की . वर्तमान में म.प्र.पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी में अधीक्षण अभियंतa के रूप में सेवारत हूं . IGNOU से १९९२ में मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया तथा २००७ में ब्युरो आफ इनर्जी एफीशियेंशी से इनर्जी मैनेजर की परीक्षा पास की . कम्प्यूटर कोर्स तथा सी कैड के कोर्सेज भी मैने किये हैं . इंजीनियरिंग स्टाफ कालेज हैदराबाद से पिलफ्रेज आफ इलेक्ट्रिसिटी पर  शार्ट टर्म कोर्स भी किया ,  अनेक सेमीनारो में हिस्सेदारी भी की .
मण्डला जिले में बन रहे चुटका परमाणु बिजलीघर का  परियोजना प्रतिवेदन तैयार करने का अवसर मुझे  मिला . मुझे गर्व है कि  मेरे द्वारा तैयार परियोजनाओ में से भीमगढ़ , चरगांव जटलापुर आदि पन बिजली घर निरंतर विद्युत उत्पादन कर रहे हैं .मध्यप्रदेश में  २४ घंटे विद्युत आपूर्ति की महत्वाकांक्षी अटल ज्योति योजना के क्रियांवयन में भी मैं सक्रियता से जुड़ा रहा हूं .मुझे म. प्र. साहित्य अकादमी तथा गाडफ्रे फिलिप्स के प्रतिष्ठित पुरुस्कार रचनात्मक लेखन व सामाजिक कार्यो हेतु मिल चुके हैं .
रायपुर इंजीनियरिंग में मैं इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के स्टूडेंट चैप्टर का संस्थापक प्रेसीडेंट चुना गया था , और इस रूप में हमने वहां पत्रिका का प्रकाशन , फोटोग्राफी काम्पटीशन व सेमीनार जैसे कई सफल आयोजन किये थे .

मै इंस्टीट्यूशन के सिविल डीवीजन के काउंसिल इलेक्शन में चुने जाने के लिये आपके समर्थन का आकांक्षी हूं ,  मेरा प्रयास होगा कि तकनीकी विषयो को जनभाषा में प्रस्तुत करने तथा इंस्टीट्यूशन की गतिविधियो से छात्रो व आम नागरिको को जोड़ने में विशेष योगदान दे सकूं . इंस्टीट्यूशन की सदस्यता बढ़ाना और सभी सदस्यो के बीच सघन परस्पर परिचय बढ़ाना , समाज में इंजीनियर्स के महत्व को पुनर्स्थापित करना मेरी प्राथमिकता होगी .
यदि इंस्टीट्यूशन में आपका मोबाइल या ई मेल पता पंजीकृत है तो आपके पास इलेक्ट्रानिक पद्धति से इंटरनेट के माध्यम से इंस्टीट्यूशन की वेब साइट पर इलेक्शन विंडो पर वोट करने के लिये पासवर्ड तथा यूजर आई डी का SMS व MAIL आयेगा .जिससे लागइन करके आप वोट कर पायेंगे .  अन्यथा आपके डाक के पंजीकृत पते पर बैलट आयेगा . ५ सीटो के लिये कुल ४१ उम्मीदवार खड़े हैं ,मेरा नाम क्रमांक ३७ पर है . यदि डाक से वोट डालें तो ध्यान से चाही गई फोटो आई डी पर हस्ताक्षर करके उसे साथ रखना न भूलें .
निवेदन है कि मुझे आपका कीमती वोट देकर समर्थन देने की कृपा करें . आपके सहयोग का आकांक्षी हूं , हम सब मिलकर ही इंस्टीट्यूशन को नई उंचाईयो पर ले जा सकेंगे .
आपके उत्तर से मेरा संबल बढ़ेगा . सादर .
विवेक रंजन श्रीवास्तव

vivek ranjan shrivastava FIE

03 जुलाई, 2016

देश की अखण्डता के लिये देश के हर हिस्से में सभी धर्मो के लोगो का बिखराव जरूरी है

देश की अखण्डता के लिये देश के हर हिस्से में सभी धर्मो के लोगो का बिखराव जरूरी है

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
अधीक्षण अभियंता सिविल, म प्र पू क्षे विद्युत वितरण कम्पनी
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर ४८२००८
फोन ०७६१२६६२०५२

        प्रश्न है देशों का निर्माण  कैसे हुआ  ?  भौगोलिक स्थितियो के अनुसार लोगो का रहन सहन लगभग एक समान ही होता है . नदियो , पहाड़ो , रेगिस्तानो जैसी प्राकृतिक बाधाओ ने प्राचीन समय में देशो की सीमायें निर्धारित की . इतिहास साक्षी है कि एक ही विचारधारा और धर्म के मानने वाले भी एक ही राज्य के झंडे तले एकजुट होते रहे . विस्तार वादी नीतीयो से जब युद्ध राजधर्म सा बन गया तो सेनाओ को एकजुट रखने में भी धर्म का उपयोग किया गया . पिछली सदी में जब दुनिया में लोकतांत्रिक मूल्यो का महत्व बढ़ा तो ,विस्तारवादी  युद्धो की वैश्विक भर्तसना होनी शुरु हुई . पर किंबहुना आज भी देशो के नक्शे  क्षेत्रो की भौगोलिक स्थिति  , राष्ट्रो की शक्तिसंपन्नता , वैचारिक और धार्मिक आधारो पर ही तय हो रहे हैं . भारत एक लोकतांत्रिक विश्व शक्ति है . हमारा संविधान हमें धार्मिक स्वतंत्रता देता है  .संविधान के अनुच्छेद (२५-२८) के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार वर्णित हैं, जिसके अनुसार नागरिकों को  अंत:करण  और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्‍वतंत्रता, धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्‍वतंत्रता , किसी विशिष्‍ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय के बारे में स्‍वतंत्रता तथा धार्मिक शिक्षा संस्‍थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में भारत के हर नागरिक को संविधान द्वारा स्‍वतंत्रता प्रदान की गई है .
        हमारा संवैधानिक स्वरूप धर्म निरपेक्ष है ,  किंतु फिर भी देश में राजनीति धर्म आधारित ही है . चुनावों में सरे आम धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर वोटो का अंदाजा लगाकर पार्टियां उम्मिदवार तय करती हैं , मीडिया जातिगत वोटो की खुले आम चर्चा करता है पर चुनाव आयोग मौन रहता है ! मुझे लगता है देश में संविधान को गिने चुने लोगो द्वारा आम जनता पर थोपा गया है , यह ठीक रहा क्योकि संविधान व्यापक रूप से जनहितकारी है , पर जनमानस से ऐसे उदार संविधान की मांग  उठने से पहले ही संविधान बना दिया गया जिसके चलते आम आदमी संविधान के महत्व से अपरिचित है , और इतर संवैधानिक गतिविधियो में संलग्न है . आज जरुरत लगती है कि देश की जनता को संविधान से परिचित करवाने के लिये अभियान चलाया जाये . जिससे आज के युवा नागरिक भी अपने संविधान पर गर्व करें और तद्अनुसार आचरण करें .
        काशमीर से हिंदू पंडितो का विस्थापन , और अब उन्हें पुनः वहाँ बसाने को लेकर राजनीति गर्माई हुई है . पूर्वोत्तर के राज्यो में ईसाई धर्म का बाहुल्य है , और विदेशी ताकतें व ईसाई मिशनरियां धर्म के आधार पर वहां एकजुटता बनाकर देश विरोधी संगठन खडे करती रहती हैं . तमिलनाडु में धर्म के आधार पर ही श्रीलंका से सिंहली कनेक्शन रहे हैं , स्व राजीव गांधी की हत्या इसका ही दुष्परिणाम था . केरल में क्रिश्चेनिटी के कारण ही एक ही दल लगातार सत्ता पर बरसो से काबिज बना रहा है . हिंदी बहुल क्षेत्रो की बात की जाये तो धर्म ही नहीं  जाति के आधार पर भी ध्रुवीकरण की तस्वीर साफ दिखती है . बिहार और उत्तर प्रदेश में यादवो का बोलबाला है . उत्तर प्रदेश में राम मंदिर के निर्माण को मुद्दा बनाकर यदि चुनाव लड़ा जाये,   दलितो की अलग राजनैतिक पार्टी ही बन जाये और राजनेताओ द्वारा मुस्लिम तुष्टीकरण से वोट पाने की होड़ लगाई जाये तो मेरी समझ में यह संविधान का खुल्लम खल्ला मजाक है .जो सरे आम ताल ठोंककर राजनेता उड़ा रहे हैं व आम जनता दिग्भ्रमित है . गुजरात का पटेल आंदोलन तथा हरियाणा व राजस्थान का जाट आंदोलन ताजी तरीन बात है . १९५६ में जब प्रदेशो की पुनर्स्थापना की गई तो मध्य प्रदेश की राजधानी जबलपुर की जगह भोपाल में इसी आधार पर बनाई गई थी कि भोपाल में मुस्लिम बाहुल्य होने के कारण वहां राजधानी बनने से गैर मुस्लिमो की पदस्थापनायें हो और धार्मिक समरसता बन सके . किसी हद तक भोपाल के इस प्रयोग ने एक अच्छा उदाहण भी प्रस्तुत किया . आज भी धार्मिक दंगे उन्हीं क्षेत्रो में होते हैं जहां किसी एक धर्म या जाति का बाहुल्य है .आबादी की  धार्मिक समरसता व संतुलन  से मिलनसारिता बढ़ती ही है . ऐसा सारे देश में किया जाना जरूरी है .
        काश्मीर में हि्दू पंडितो के लिये  सैनिक सुरक्षा में अलग कालोनी बसाने की बात कुछ ऐसी है जैसे वहां के मुसलमान कोई जंगली जानवर हों ! मैं हाल ही काश्मीर घूम कर लौटा , यद्यपि यह सही है कि मैं वहां टूरिस्ट था और टूरिज्म आधारित व्यवसाय होने के कारण मेरे साथ संपर्क में आये मुसलमानो का व्यवहार हमारे प्रति अतिरिक्त रूप से उदार रहा होगा , पर जब एक ही शहर में रहना हो , साथ साथ जीना हो तो किसी जाति विशेष के लिये बिल्कुल अलग कालोनी बसाने के प्रस्ताव का कोई भी  समझदार व्यक्ति समर्थन नही कर सकता .काश्मीर में इस तरह की घटिया राजनीति करने की अपेक्षा वहां स्थाई रुप से इंफ्रास्ट्रक्चर डेवेलेपमेंट की आवश्यकता है . सरकारें वहां फोरलेन सड़कें बनवा दें  , बिजली व्यवस्था का सुढ़ृड़ीकरण  कर , टूरिज्म के विकास हेतु जरूरी कार्य कर  दें , बाकी सब वहां की जनता स्वयं ही कर लेगी . जब वहां रोजगार के पर्याप्त संसाधन होंगे तो वहां के युवा पढ़े लिखे मुसलमान विस्थापित हिन्दू  पंडितो को ही नहीं हर भारत वासी को धारा ३७० की अवहेलना करते हुये वहां अपने साथ बसने देंगे यह बात मैं काश्मीर में वहां के  लोगों से अनौपचारिक चर्चा के आधार पर कह रहा हूं . जैसे प्रयत्न अभी राजनेता कश्मीरी पंडितो को बसाने के लिये कर रहे हैं उससे तो स्थाई वैमनस्यता और वर्ग संघर्ष को जन्म मिलेगा . देश के अनेक शहरो में भी बंगलादेश से आये हुये शरणार्थियो की  अलग कालोनियां  बनी हुई हैं , या मुसलमानो ने या सिंधियो ने अनेक शहरो में क्षेत्र विशेष में अलग कोनो में बसाहट की हुई है . प्रशासन के लोग समझते हैं कि जहां भी इस तरह की असंतुलित आबादी की बस्तियां हैं वहां त्यौहार विशेष या धार्मिक असद्भाव फैलने पर कितनी कठिनाई से ला एण्ड आर्डर मेंटेन हो पाता है . गुजरात में बिल्डिंग विशेष उपद्रवियो का निशाना इसीलिये बन सकी क्योकि वहां धर्म विशेष के लोग रहते थे . मेरा सुझाव है कि कानून बनाकर जातिगत या धर्मगत आधार पर कालोनियो और बिल्डिंगो में  एक साथ एक ही वर्ग के लोगो को रहने पर रोक लगा देनी चाहिये . इस तरह के आवासीय ध्रुवीकरण की कल्पना तक संविधान निर्माताओ ने नही की होगी . वर्ग विशेष के लोग यदि इस तरह की आवास व्यवस्था में स्वयं को सुरक्षित मानते हैं तो ऐसी  परिस्थितियों के लिये विगत ७० वर्षो की राजनीति ही दोषी कही जायेगी .
        संविधान निर्माताओ के सपने का सच्चा धर्म निरपेक्ष भारत तभी वास्तविक स्वरूप ले सकता है जब सारे देश के हर हिस्से में सभी धर्मो के लोगो का स्वतंत्र बिखराव हो , यह देश की अखण्डता के लिये आवश्यक है . आशा है राजनेता क्षुद्र राजनीति से उपर उठकर देश के दीर्घ कालिक व्यापक हित में इस दिशा में चिंतन मनन और काम करेंगे . अन्यथा नई पीढ़ी के पढ़े लिखे लड़के लड़कियो ने जैसे आज विवाह तय करने में माता पिता और परिवार की भूमिका को  गौंण कर दिया है उसी तरह सरकारो को दरकिनार करके समाज को देश की धार्मिक अखण्डता के लिये स्वतः ही कोई न कोई कदम उठाना ही पड़ेगा .

01 जुलाई, 2016

जलाशयो , वाटर बाडीज , शहरो के पास नदियो को ऊंचा नही गहरा किया जावे

जल संग्रह गहरा हो ऊंचा नहीं

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
अधीक्षण अभियंता सिविल, म प्र पू क्षे विद्युत वितरण कम्पनी
फैलो आफ इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर ४८२००८
फोन ०७६१२६६२०५२

            पानी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है . सारी सभ्यतायें नैसर्गिक जल स्रोतो के तटो पर ही विकसित हुई हैं . बढ़ती आबादी के दबाव में , तथा ओद्योगिकीकरण से पानी की मांग बढ़ती ही जा रही है . इसलिये भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है और परिणाम स्वरूप जमीन के अंदर पानी के स्तर में लगातार गिरावट होती जा रही है . नदियो पर हर संभावित प्राकृतिक स्थल पर बांध बनाये गये हैं . बांधो की ऊंचाई को लेकर अनेक जन आंदोलन हमने देखे हैं . बांधो के दुष्परिणाम भी हुये , जंगल डूब में आते चले गये और गांवो का विस्थापन हुआ . बढ़ती पानी की मांग के चलते जलाशयों के बंड रेजिंग के प्रोजेक्ट जब तब बनाये जाते हैं . अब समय आ गया है कि जलाशयो , वाटर बाडीज , शहरो के पास नदियो  को ऊंचा नही गहरा किया जावे .
            यांत्रिक सुविधाओ व तकनीकी रूप से विगत दो दशको में हम इतने संपन्न हो चुके हैं कि समुद्र की तलहटी पर भी उत्खनन के काम हो रहे हैं . समुद्र पर पुल तक बनाये जा रहे हैं बिजली और आप्टिकल सिग्नल केबल लाइनें बिछाई जा रही है . तालाबो , जलाशयो की सफाई के लिये जहाजो पर माउंटेड ड्रिलिंग , एक्सकेवेटर , मडपम्पिंग मशीने उपलब्ध हैं . कई विशेषज्ञ कम्पनियां इस क्षेत्र में काम करने की क्षमता सम्पन्न हैं .मूलतः इस तरह के कार्य हेतु किसी जहाज या बड़ी नाव , स्टीमर पर एक फ्रेम माउंट किया जाता है जिसमें मथानी की तरह का बड़ा रिग उपकरण लगाया जाता है , जो जलाशय की तलहटी तक पहुंच कर मिट्टी को मथकर खोदता है , फिर उसे मड पम्प के जरिये जलाशय से बाहर फेंका जाता है . नदियो के ग्रीष्म काल में सूख जाने पर तो यह काम सरलता से जेसीबी मशीनो से ही किया जा सकता है . नदी और बड़े नालो मे भी  नदी की ही चौड़ाई तथा लगभग एक किलोमीटर लम्बाई में चम्मच के आकार की लगभग दस से बीस मीटर की गहराई में खुदाई करके रिजरवायर बनाये जा सकते हैं . इन वाटर बाडीज में नदी के बहाव का पानी भर जायेगा , उपरी सतह से नदी का प्रवाह भी बना रहेगा जिससे पानी का आक्सीजन कंटेंट पर्याप्त रहेगा . २ से ४ वर्षो में इन रिजरवायर में धीरे धीरे सिल्ट जमा होगी जिसे इस अंतराल पर ड्रोजर के द्वारा साफ करना होगा . नदी के क्षेत्रफल में ही इस तरह तैयार जलाशय का विस्तार होने से कोई भी अतिरिक्त डूब क्षेत्र जैसी समस्या नही होगी . जलाशय के पानी को पम्प करके यथा आवश्यकता उपयोग किया जाता रहेगा .
            अब जरूरी है कि अभियान चलाकर बांधो में जमा सिल्ट ही न निकाली जाये वरन जियालाजिकल एक्सपर्टस की सलाह के अनुरूप  बांधो को गहरा करके उनकी जल संग्रहण क्षमता बढ़ाई जाने के लिये हर स्तर पर प्रयास किये जायें . शहरो के किनारे से होकर गुजरने वाली नदियो में ग्रीष्म ‌‌काल में जल धारा सूख जाती है , हाल ही पवित्र क्षिप्रा के तट पर संपन्न उज्जैन के सिंहस्थ के लिये क्षिप्रा में नर्मदा नदी का पानी पम्प करके डालना पड़ा था . यदि क्षिप्रा की तली को गहरा करके जलाशय बना दिया जावे  तो उसका पानी स्वतः ही नदी में बारहो माह संग्रहित रहा आवेगा  .  इस विधि से बरसात के दिनो में बाढ़ की समस्या से भी किसी हद तक नियंत्रण किया जा  सकता है . इतना ही नही गिरते हुये भू जल स्तर पर भी नियंत्रण हो सकता है क्योकि गहराई में पानी संग्रहण से जमीन रिचार्ज होगी , साथ ही जब नदी में ही पानी उपलब्ध होगा तो लोग ट्यूब वेल का इस्तेमाल भी कम करेंगे . इस तरह दोहरे स्तर पर भूजल में वृद्धि होगी . नदियो व अन्य वाटर बाडीज के गहरी करण से जो मिट्टी , व अन्य सामग्री बाहर आयेगी उसका उपयोग भी भवन निर्माण , सड़क निर्माण तथा अन्य इंफ्रा स्ट्रक्चर डेवलेपमेंट में किया जा सकेगा . वर्तमान में इसके लिये पहाड़ खोदे जा रहे हैं जिससे पर्यावरण को व्यापक स्थाई नुकसान हो रहा है , क्योकि पहाड़ियो की खुदाई करके पत्थर व मुरम तो प्राप्त हो रही है पर इन पर लगे वृक्षो का विनाश  हो रहा है , एवं पहाड़ियो के खत्म होते जाने से स्थानीय बादलो से होने वाली वर्षा भी प्रभावित हो रही है .
            नदियो की तलहटी की खुदाई से एक और बड़ा लाभ यह होगा कि इन नदियो के भीतर छिपी खनिज संपदा का अनावरण सहज ही हो सकेगा . छत्तीसगढ़ में महानदी में स्वर्ण कण   मिलते हैं ,तो कावेरी के थले में प्राकृतिक गैस , इस तरह के अनेक संभावना वाले क्षेत्रो में विषेश उत्खनन भी करवाया जा सकता है .
            पुरातात्विक महत्व के अनेक परिणाम भी हमें नदियो तथा जलाशयो के गहरे उत्खनन से मिल सकते हैं , क्योकि भारतीय संस्कृति में आज भी अनेक आयोजनो के अवशेष  नदियो में विसर्जित कर देने की परम्परा हम पाले हुये हैं . नदियो के पुलो से गुजरते हुये जाने कितने ही सिक्के नदी में डाले जाने की आस्था जन मानस में देखने को मिलती है . निश्चित ही सदियो की बाढ़ में अपने साथ नदियां जो कुछ बहाकर ले आई होंगी उस इतिहास को अनावृत करने में नदियो के गहरी करण से बड़ा योगदान मिलेगा .
            पन बिजली बनाने के लिये अवश्य ऊँचे बांधो की जरूरत बनी रहेगी , पर उसमें भी रिवर्सिबल रिजरवायर , पम्प टरबाईन टेक्नीक से पीकिंग अवर विद्युत उत्पादन को बढ़ावा देकर गहरे जलाशयो के पानी का उपयोग किया जा सकता है .
            मेरे इस आमूल मौलिक  विचार पर भूवैज्ञानिक , राजनेता , नगर व ग्राम स्थानीय प्रशासन , केद्र व राज्य सरकारो को तुरंत कार्य करने की जरुरत है , जिससे महाराष्ट्र जैसे सूखे से देश बच सके कि हमें पानी की ट्रेने न चलानी पड़े , बल्कि बरसात में हर क्षेत्र की नदियो में बाढ़ की तबाही मचाता जो पानी व्यर्थ बह जाता है तथा साथ में मिट्टी बहा ले जाता है वह नगर नगर में नदी के क्षेत्रफल के विस्तार में ही गहराई में साल भर संग्रहित रह सके और इन प्राकृतिक जलाशयो से उस क्षेत्र की जल आपूर्ति वर्ष भर हो सके.

04 मई, 2016

मितव्ययी प्रकाश की उजाला योजना उर्जा संरक्षण का ज्वलंत उदाहरण

मितव्ययी प्रकाश की उजाला योजना उर्जा संरक्षण का ज्वलंत उदाहरण

विवेक रंजन श्रीवास्तव
अधीक्षण अभियंता
ओ बी ११ विद्युत मण्डल कालोनी रामपुर , जबलपुर
मो ९४२५८०६२५२, vivek1959@yahoo.co.in

    हमारे जीवन में बिजली का महत्व निर्विवाद है . आज भी सुबह तथा शाम के पीक लोड टाइम में देश बिजली की कमी से जूझ रहा है . मध्यप्रदेश में वर्ष 2018 तक 20 हजार मेगावॉट बिजली बनाने का लक्ष्य है  . बिजली का प्राथमिक उपयोग प्रकाश के लिये ही किया जाता है . प्रकाश के लिये पहले टंगस्टन फिलामेंट बल्ब बाजार में आये जिनमें फिलामेंट गरम होकर पीले रंग का प्रकाश देता है , और ढ़ेर सी बिजली उष्मा के रूप में व्यर्थ हो जाती है . इन बल्बों से बिजली की खपत की तुलना में कम ल्युमेन प्रकाश मिलता है .

    फिर ट्यूबलाइट प्रकाश के बेहतर यंत्र के रूप में प्रस्तुत हुई , जिसमें सफेद दूधिया आंखो को न चुभने वाला प्रकाश मरक्युरी वेपर के जरिये उत्पन्न किया जाता है . इसी के परिष्कृत रूप में सी एफ एल अर्थात काम्पेक्ट फ्लुरोसेंट लैंप वैज्ञानिको ने बनाये जिनमें अपेक्षाकृत कम बिजली की खपत में अधिक ल्युमेन प्रकाश उत्सर्जित कर पाने में सफलता मिली .  सी एफ एल का सबसे दुखद पहलू कीमत के अनुपात में उसकी सीमित आयु है , और उससे भी अधिक दुखद है खराब सीएफएल का निस्तारण अर्थात उसका पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला पहलू . खराब  सीएफएल को यदि यूं ही फेंक दिया जावे तो उसकी कांच टूटने पर जो मरकरी वातावरण में फैलता है वह पर्यावरण के लिये बेहद नुकसानदेह है .

    अब वैज्ञानिको ने छोटे छोटे  एल ई डी अर्थात लाइट इमिटिंग डायोड को एक साथ संघनित करके रिफ्लैक्टर की मदद से एल ई डी लैम्प विकसित किये हैं ,इन बल्ब का प्रकाश दूधिया , आखों के लिये ठंडक का अहसास लिये हुये है . जिनसे न्यूनतम बिजली की खपत में अधिकतम प्रकाश पाया जा रहा है . चूंकि अभी यह अन्वेषण नया है , स्वाभाविक रूप से इसकी बाजार में कीमत अधिक है , जिसके चलते आम नागरिक इसके उपयोग से कतरा रहे हैं .  इस लिये केंद्र सरकार इन एल ई डी लैंप्स के उपयोग को बढ़ावा देने की उजाला योजना लेकर सामने आई है . लागत से भी कम मूल्य पर एल ई डी लैंप नागरिको को सुलभ करवाये जा रहे हैं . इससे उपभोक्ताओं का बिजली बिल ३० से ४० प्रतिशत तक कम हो जायेगा और बिजली वितरण कम्पनी की उस बिजली की खपत कम होगी  जो प्रकाश के लिये उपयोग होती है . इससे शाम के पीकिंग अवर्स में उर्जा विभाग को लोड मैनेजमेंट में सुविधा होगी .

     उजाला योजना में सभी पुराने बल्बों को बदल कर एल.ई.डी. बल्ब लगाये जायेंगे। पिछले एक वर्ष में देश में 9 करोड़ एल.ई.डी. बल्ब लगाये गये हैं जिससे वर्ष भर में 5,500 करोड़ रुपये की बचत अनुमानित है . वर्ष 2019 तक देश में 77 करोड़ पुराने बल्ब बदलकर एल.ई.डी. बल्ब लगाये जायेंगे, जिससे जनता को बिजली के व्यय में 40 हजार करोड़ रुपये का लाभ अनुमानित है .
    मध्य प्रदेश में ऍनर्जी एफीशियेंसी सर्विसेज लिमिटेड ये एल ई डी बल्ब वितरित करने हेतु अधिकृत हैं . जो जगह जगह काउंटर लगाकर इन बल्ब का वितरण सब्सिडाइज्ड दरो पर कर रहे हैं . मात्र ८५ रुपयो में ९ वाट खपत वाला  एल ई डी बल्ब दिया जा रहा है जिसकी बाजार में कीमत अलग अलग कम्पनियो की अलग अलग है पर फिर भी कम से कम लगभग ३०० रुपये है . यह बल्ब ९०० ल्यूमेन का प्रकाश देता है . वितरित किये जा रहे बल्ब के ३ वर्ष के जीवन की गारंटी है .प्रत्येक उपभोक्ता को बिजली बिल दिखाने पर अधिकतम २५ बल्ब प्रति बल्ब ८५ रुपयो की कीमत पर सुलभ किये जा रहे हैं  .
    केंद्रीय उर्जा विभाग द्वारा एक मोबाइल एप बनाया गया है जिसमें अब तक लगाये गये एल.ई.डी. बल्ब की देश-प्रदेश और शहरवार जानकारी मिलती है।
मध्यप्रदेश में उजाला योजना के तहत तीन करोड़ एल.ई.डी. बल्ब बाँटे जाने का लक्ष्य है ,  इससे 2,500 करोड़ रुपये की बचत बिजली बिलों में  होगी. एलईडी लैंप उर्जा संरक्षण का अनोखा उदाहरण हैं . यदि हम बाजार भाव पर भी खरीदकर सारे घर में प्रकाश के लिये केवल  एल.ई.डी. बल्ब ही प्रयुक्त करें तो कुछ महीनो में ही हमारे बिजली बिल में कमी से जो बचत होती है उससे इन बल्बों पर किया गया हमारा व्यय वसूल हो जाता है , फिर यदि उजाला योजना के अंतर्गत हमें सीमित मूल्य पर ये एल.ई.डी. बल्ब उपलब्ध हो रहे हैं तब तो बिना किसी विलंब के हमें यह कार्य कर ही लेना चाहिये , इससे न केवल हम स्वयं का बिजली बिल नियंत्रित कर सकते हैं वरन इस तरह बचाई गई बिजली का उपयोग देश के उद्योगो हेतु होगा और इस तरह हम देश के विकास में भी भागीदारी कर सकते हैं .

विवेक रंजन श्रीवास्तव


17 अप्रैल, 2016

सिंहस्थ कुंभ के लिये विद्युत आपूर्ति की अद्वितीय व्यवस्था

सिंहस्थ कुंभ के लिये  विद्युत आपूर्ति की अद्वितीय व्यवस्था

इंजी विवेक रंजन श्रीवास्तव
अधीक्षण अभियंता
म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी , ओबी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी रामपुर , जबलपुर ४८२००८
mob 9425806252

कुंभ मेले की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से ही मानी जाती है , मान्यता है कि  आदि शंकराचार्य ने इनकी विधिवत शुरुआत की थी. पौराणिक कथानक के अनुसार समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश हेतु देवताओ और राक्षसों के युद्ध के दौरान धरती पर अमृत की कुछ बूंदें छलक गई थी. ये पवित्र स्थान जहाँ अमृत घट छलका था ,  गंगा तट पर हरिद्वार, गंगा यमुना सरस्वती संगम स्थल पर प्रयाग, क्षिप्रा तट पर उज्जैन और गोदावरी के किनारे नासिक थे।  ग्रहों की निर्धारित स्थितयो के पुनर्निर्मित होने के अनुसार जो लगभग हर 12 वर्षों में वैसी ही बनतीं हैं , क्रमशः हरिद्वार, इलाहाबाद (प्रयाग), नासिक और उज्जैन में लगभग बारह वर्षों के अन्तराल से कुंभ का आयोजन किया जाता है। कुंभ के आयोजन के ६ वर्षो के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन किया जाता है . हरिद्वार में पिछला कुंभ २०१० में आयोजित हुआ था ,यहां अगला कुंभ मेला २०२२ में संपन्न होगा . प्रयाग में पिछला कुंभ २०१३ में भरा था . नासिक में पिछला कुंभ २०१५ में संपन्न हुआ . उज्जैन में पिछला कुंभ २००४ में आयोजित हुआ था .   अमृत-कुंभ के लिये स्वर्ग में बारह दिन तक संघर्ष चलता रहा था  , ये १२ दिन पृथ्वी के अनुसार १२ वर्ष के बराबर होते हैं , इसीलिये हर १२ वर्षो में कुंभ का आयोजन किये जाने की परम्परा बनी .  प्रत्येक १४४ वर्षो में हरिद्वार तथा प्रयाग में आयोजित कुंभ को महा कुंभ के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है . उज्जैन के इस विशाल आयोजन के बाद अब २०१९ में प्रयाग मे अर्धकुंभ , २०२१ में नासिक में अर्धकुंभ के बाद २०२२ में हरिद्वार में कुंभ का भव्य आयोजन होगा , उसी वर्ष उज्जैन में अर्धकुंभ भी आयोजित होगा . उज्जैन में अगला कुंभ २०२८ में संपन्न होगा .

इस बार  सिंहस्थ मेला में  बढ़ती आबादी और धार्मिक आस्था के चलते करोड़ो लोगो के पहुंचने का अनुमान है . देश में जब जब भारी भीड़ किसी भी आयोजन में एकत्रित होती है तो भीड़ का प्रबंधन प्रशासन के लिये एक चुनौती होता है . आतंक के बढ़ते खतरे के तथा किसी दुर्घटना की संभावना के बीच सुरक्षित आयोजन संपन्न करवाना स्थानीय प्रशासकीय व्यवस्था की दक्षता प्रदर्शित करता है . बचाव की आकस्मिक आपात व्यवस्था आवश्यक होती है .स्वयं मुख्यमंत्री जी तथा प्रमुख सचिव महोदय उज्जैन के इस वैश्विक आयोजन की तैयारियो में जुटे हुये है .  बिजली की निर्बाध आपूर्ति किसी भी आयोजन की सफलता हेतु आज अति आवश्यक हो चुकी है . उज्जैन सिंहस्थ तेज गर्मी में होने को है , अतः न केवल प्रकाश वरन शीतली करण हेतु भी बिजली की जरूरत पड़ेगी . क्षिप्रा में पर्याप्त जल आपूर्ति हेतु  ‘नर्मदा-क्षिप्रा सिंहस्थ लिंक परियोजना’ की स्वीकृति दी गई . इस परियोजना की कामयाबी से महाकाल की नगरी में पहुंची हैं मां नर्मदा . इससे  क्षिप्रा नदी को नया जीवन मिलने के साथ मालवा अंचल को गंभीर जल संकट से स्थायी निजात हासिल होने की उम्मीद है . नर्मदा के जल को बिजली के ताकतवर पम्पों की मदद से कोई 50 किलोमीटर की दूरी तक बहाकर और 350 मीटर की उंचाई तक लिफ्ट करके क्षिप्रा के प्राचीन उद्गम स्थल तक  इंदौर से करीब 30 किलोमीटर दूर उज्जैनी गांव की पहाड़ियों पर जहां क्षिप्रा  लुप्त प्राय है , लाने की व्यवस्था की गई है . नर्मदा नदी की ओंकारेश्वर सिंचाई परियोजना के खरगोन जिले स्थित सिसलिया तालाब से पानी लाकर इसे क्षिप्रा के उद्गम स्थल पर छोड़ने की परियोजना से नर्मदा का जल क्षिप्रा में प्रवाहित होगा और तकरीबन 115 किलोमीटर की दूरी तय करता हुआ धार्मिक नगरी उज्जैन तक पहुंचेगा . ‘नर्मदा-क्षिप्रा सिंहस्थ लिंक परियोजना’ की बुनियाद 29 नवंबर 2012 को रखी गयी थी। इस परियोजना के तहत चार स्थानों पर पम्पिंग स्टेशन बनाये गये हैं। इनमें से एक पम्पिंग स्टेशन 1,000 किलोवॉट क्षमता का है, जबकि तीन अन्य पम्पिंग स्टेशन 9,000 किलोवाट क्षमता के हैं।इनके सुचारु संचालन के लिये भी पर्याप्त अबाध बिजली की आपूर्ति जरूरी है जिसकी विशेष व्यवस्था की जा चुकी है .

सिंहस्थ क्षेत्र में प्रतिदिन १०० मेगावाट बिजली की खपत का अनुमान है जिसके लिये  चार ३३/११ किलो वोल्ट के सबस्टेशन शेखपुर, ज्योतिनगर, रतढिया, भैरवगढ़ अपडेट किये जा चुके हैं जिनसे ५० फीसदी बिजली सप्लाई होगी जैसे ही किसी भी सब स्टेशन में फाल्ट आयेगा, सेकेंड सिस्टम एक्टिवेट होकर स्वतः संचालित प्रणाली से सप्लाई देने लगेगा . यदि  चारों सब स्टेशन से सप्लाई भी बंद हो गई तो सिंहस्थ में ५० ऑटोमेटिक साइलेंट डीजल जनरेटर वैकल्पिक रूप से स्थापित किये गये हैं जो काम करने लगेंगे और १३ सेकेंड में ही सिंहस्थ के प्रमुख मार्ग को रोशन कर देंगे , सामान्य जरूरत की २० फीसदी बिजली इनसे पैदा होगी . पूरे सिंहस्थ क्षेत्र में केबली करण के साथ प्रचुर मात्रा में वितरण ट्रांसफारमर स्थापित किये गये हैं जिससे कोई भी ट्रांस्फारमर ओवर लोड न होने पावे , फिर भी व्यवस्था है कि किसी क्षेत्र में सप्लाई ब्रेक होते ही फॉल्ट स्काडा सिस्टम आइडेन्टीफाई करेगा , टेक्निशियन अगले तीन मिनट में उसे ठीक करेगा . स्काडा बिजली फॉल्ट को पकड़ने का अत्याधुनिक सिस्टम है इसमें कम्प्यूटर प्रणाली के जरिए फाल्ट के पिन पाइंट स्थान और वजह चिन्हित हो जाती है . वायरलेस से सूचना दी जावेगी  और अलग-अलग क्षेत्रों में तैनात १५० से अधिक टेक्निशियन में से संबंधित कर्मचारी तुरंत ही  में खराबी को ठीक करने पहुंचेंगे .
जुलाई २०१२ में हुये नार्दन ग्रिड फेलियर से सबक लेकर बिजली कंपनी ने इस तरह के किसी बड़े आकस्मिक आपूर्ति खतरे से निपटने का भी इंतजाम किया है . बिजली कंपनी ने इमरजेंसी में गांधी सागर हाइडिल पॉवर प्लांट को २४ घंटे चालू रखने की तैयारी की है.  यहां से करीब २२ मेगावाट बिजली पैदा हो रही है . फेलियर के वक्त गांधी सागर से उज्जैन के बीच अलग बिजली लाइन के जरिए १० मिनट में बिजली बैकअप मिल पाएगा .मप्र पॉवर ट्रांसमिशन कंपनी ने जबलपुर से एक्सपर्ट अभियंताओ की टीम भेजी गई है .अनुमान है कि लगभग  २०० मेगावाट के करीब बिजली सिंहस्थ के लिए लगेगी जिसका  मूल्य ६५ करोड़ होगा . नवकरणीय व वैकल्पिक उर्जा की भी जगह जगह किंचित यथा सुविधा यथा आवश्यकता व्यवस्थायें की गई हैं . सारा प्रशासन इस भव्य आयोजन को निर्विघ्न सफल बनाने हेतु सक्रिय है , और उज्जैन में तथा विशेष रूप से सिंहस्थ क्षेत्र में निर्बाध विद्युत आपूर्ति का लक्ष्य मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी , म. प्र. पावर ट्रांसमिशन कम्पनी एवं म.प्र. पावर जनरेटिंग कम्पनी , पावर मैनेजमेंट कम्पनी , तथा समूचे म. प्र.  ऊर्जा मंत्रालय  की सर्वोच्च प्राथमिकता है . ये सारी व्यवस्थायें अद्वितीय हैं .

11 नवंबर, 2014

कटियाबाज बिजली चोरी की सामाजिक बुराई प्रदर्शित करती एक महत्वपूर्ण डाक्युमेंट्री

कटियाबाज बिजली चोरी  की सामाजिक बुराई प्रदर्शित करती  एक महत्वपूर्ण डाक्युमेंट्री

विवेक रंजन श्रीवास्तव
अधीक्षण अभियंता व जनसंपर्क अधिकारी
म. प्र. पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी जबलपुर
मो ९४२५८०६२५२ ई मेल vivek1959@yahoo.co.in

म. प्र. पावर मैनेजमेंट कम्पनी के सी एम डी श्री मनु श्रीवास्तव आई ए एस के इनीशियेटिव पर , विद्युत मण्डल परिसर के  तरंग प्रेक्षागृह में विगत दिवस समानांतर सिनेमा और फीचर फिल्मो को चुनौती देती   'कटियाबाज' नाम की एक डॉक्यूमेंट्री विद्युत कर्मियो के लिये विशेष रूप से आयोजित शो में प्रदर्शित की गई । इस अवसर पर फिल्म के सह निर्देशक श्री फहद मुस्तफा विशेष रूप से उपस्थित रहे , जिन्होने शो के उपरांत दर्शको से विस्तृत संवाद भी किया तथा कटियाबाज को लेकर अपने अनुभव साझा किये .  दीप्ति कक्कड़ भी इस फिल्म की सह निर्देशिका हैं . कटियाबाज का अर्थ होता है  वे लोग जो बिजली लाइन पर तार फंसाकर बिजली चोरी करते हैं। इस सामाजिक बुराई से बिल भरने वाले नियम पसंद उपभोक्ताओ पर व्यर्थ बिजली बिलो का भार बढ़ता है , तथा बिजली कंपनियो का घाटा बढ़ता जा रहा है .
इस महत्वपूर्ण समस्या पर निर्मित यह पहली बड़ी फिल्म है .

इससे पहले भी कुछ फिल्मो के कुछ अंश बिजली से संबंधित विषयो पर संदेश देने वाले रहे हैं जैसे 
विवाह समारोहो में बिजली चोरी के खिलाफ संदेशा .. फिल्म बैंड बाजा बारात में ...दिया गया है .
.शादी विवाह , अन्य सार्वजनिक , धार्मिक  समारोहो में बिना बिजली का नियमित कनेक्शन लिये हुये खंभे से सीधे तार जोड़कर बिजली ले लेना जैसे हमारे यहाँ अधिकार ही माना जाने लगा है ...  इस बिजली चोरी के विरुद्ध बैंड बाजा बारात में फिल्म की हीरोइन अनुष्का शर्मा एक डायलाग में संदेश  देती हैं तथा इसे गलत ठहराती हैं . ... भई वाह ! लेखक , निर्देशक को भी बधाई !

अनुष्का शर्मा की पिछली फिल्म "रब ने बना दी जोडी" में भी शाहरूख खान का " पंजाब पावर लाइटनिंग योर लाइफ्स " वाला डायलाग भी बिजली सैक्टर के लोगो के लिये इंस्पायरिंग था .

'स्वदेश' फिल्म में शाहरुख खान को हमने बिजली तैयार करते देखा । जम्मू में किश्तवाड़ का गुलाबगढ़ इलाका , यहां इस फिल्म को देखकर प्रेरणा ली ध्यान सिंह और जोगिन्दर ने तथा खराब चक्की से बनाया पनबिजली यंत्र और बना ली बिजली . जम्मू से ३०० किमी दूर  गुलाबगढ़ के चशोती गांव में यह  प्रयोग कर दिखाया .आसपास 20 किमी तक कोई बसाहट नहीं। सड़क भी नहीं। करीब 22 हजार की आबादी बिजली न होने से अंधेरे में रहती है। लेकिन यहां के दो युवा रोशनी ले आए हैं। उन्होंने घर के पास से गुजरने वाली पहाड़ी नदी की धारा से बिजली बना ली। घर में खराब पड़ी चक्की में डेढ़ वर्ष पहले डायनामो लगाया और उसी से बिजली तैयार की। इस परिवार ने घर के अलावा मंदिर में बिजली दी हुई है। घर में डिश टीवी समेत इलैक्ट्रानिक सामान का खूब इस्तेमाल करते हैं।

'कटियाबाज' कहानी है कानपुर की, जहां किसी जमाने में चार सौ कारखाने होते थे, लेकिन अब बिजली की किल्लत के कारण करीब दो सौ कारखाने ही बचे हैं। इस डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया है कि कैसे 15 से 18 घंटे बिजली गुल होने की वजह से लोग बेहाल हैं। 'कटियाबाज' में बिजली चोर और उसके उपभोक्ता दोनों ही गरिमा और बिजली के साथ जीने के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं।

इस फिल्म का मुख्य किरदार है लोहा सिंह, जो शहर का मशहूर कटियाबाज है। लोहा सिंह लोगों के लिए बिजली की तारों पर कटिया डालता है और यह काम वह फख्र से करता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह बिजली से बेहाल लोगों की मदद कर रहा है।

दीवालिया हो चुकी सरकारी बिजली कंपनी में एक योग्य महिला अधिकारी काम संभालती हैं, जिनका नाम है ऋतु महेश्वरी। उल्लेखनीय है कि ऋतु महेश्वरी का किरदार वास्तविक है , वे उ. प्र. की आई ए एस अधिकारी हैं . वे  उपभोक्ताओं को समय पर बिजली बिलों का भुगतान करने को कहती हैं, साथ ही बिजली चोरों के खिलाफ एक अभियान भी शुरू करती हैं, पर लोगों की नजरों में वह विलेन बन जाती हैं।

इस फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि यह डॉक्यूमेंट्री होते हुए भी आपको फिल्म का मजा देगी। जो लोग छोटे शहरों में रहते हैं या फिर उन गांव या शहरों में जहां बिजली के नाम पर सिर्फ तार और खंभा हैं, तथा जो बिजली कंपनियो में कार्यरत है , वे खुद को इस फिल्म से बखूबी जोड़ पाते हैं । इस फिल्म में इमोशन है, ड्रामा है, एक्शन है और इंटरटेनमेंट भी। यहां हीरो भी है, विलेन भी और नेता भी।

ये डॉक्यूमेंट्री देखकर आप अंदाजा लगा पाएंगे कि उन शहरों की हालत कैसी होती है, जहां बिजली न के बराबर आती है और कैसे सिस्टम में फंसकर मुद्दा धरा का धरा रह जाता है। फिल्म में ऋतु महेश्वरी का एक डायलॉग है कि पहली बार ऐसा हुआ है कि उनका तबादला नहीं किया गया और उनके बेटे ने एक ही शहर में रहकर अपनी क्लास का सालाना इम्तिहान पास किया है। यह डायलॉग दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर सकता है कि आखिर इस परिस्थिति का जिम्मेदार कौन है और कैसे जनता, राजनेता और नौकरशाह अपनी-अपनी लड़ाइयां लड़ रहे हैं, पर यह ऐसी लड़ाई है जिसमें सही मायने में जीत किसी की नहीं होती।

डॉक्यूमेंट्री में बैकग्राउंड स्कोर जरा फिल्मी रखा गया है। सबसे अच्छी बात यह कि फिल्म एकतरफा नहीं है। इस परिस्थिति से जूझने वाले हर शख्स के पहलू इसमें रखे गए हैं। यह फिल्म किसी एक शख्स पर नहीं, बल्कि बिजली चोरी की समस्या पर अंगुली उठाती है।
कहानी को थोड़ा और ढंग से बांधा जा सकता था, जैसे कि कई जगहों पर घटनाक्रम या सीन्स बिखरे हुए लगे। अगर कहानी परत दर परत खुलती, तो और बेहतर होता, कथानक का अंत भी बेहतर बनाया जा सकता था , जिससे बिजली चोरी के विरुद्ध एक प्रतिबद्धता व संदेश दिया जा सकता था . वास्तविकता के चित्रांकन के चक्कर में फिल्म में कई अश्लील संवाद कानो में गड़ते हैं .  लेकिन निर्देशकों ने एक डॉक्यूमेंट्री को भी रोचक बनाकर शानदार काम किया है।

यद्यपि यह सुखद हे कि म.प्र. में अटल ज्योति अभियान के बाद से आम उपभोक्ताओ को अनवरत २४ घंटो बिजली मिल रही है .

14 सितंबर, 2014

इंजीनियर्स डे १५ सितम्बर ....भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया के जन्म दिवस पर

इंजीनियर्स डे १५ सितम्बर

भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया के जन्म दिवस पर

विवेक रंजन श्रीवास्तव
अधीक्षण अभियंता सिविल
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर जबलपुर
मो ९४२५४८४४५२

        आज अमेरिका में सिलिकान वैली में तब तक कोई कंपनी सफल नही मानी जाती जब तक उसमें कोई भारतीय इंजीनियर कार्यरत न हो ....,भारत के आई आई टी जैसे संस्थानो के इंजीनियर्स ने विश्व में अपनी बुद्धि से भारतीय श्रेष्ठता का समीकरण अपने पक्ष में कर दिखाया है . प्रतिवर्ष भारत रत्न सर मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया का जन्मदिवस इंजीनियर्स डे के रूप में मनाया जाता है . पंडित नेहरू ने कल कारखानो को नये भारत के तीर्थ कहा था , इन्ही तीर्थौ के पुजारी , निर्माता इंजीनियर्स को आज अभियंता दिवस पर बधाई ....विगत कुछ दशको में इंजीनियर्स की छबि में भ्रष्टाचार के घोलमाल में बढ़ोत्री हुई है , अनेक इंजीनियर्स प्रशासनिक अधिकारी या मैनेजमेंट की उच्च शिक्षा लेकर बड़े मैनेजर बन गये हैं , आइये आज इंजीनियर्स डे पर कुछ पल चिंतन करे समाज में इंजीनियर्स की इस दशा पर , हो रहे इन परिवर्तनो पर ... इंजीनियर्स अब राजनेताओ के इशारो चलने वाली कठपुतली नही हो गये हैं क्या? देश में आज इंजीनियरिंग शिक्षा के हजारो कालेज खुल गये हैं , लाखो इंजीनियर्स प्रति वर्ष निकल रहे हैं , पर उनमें से कितनो में वह जज्बा है जो भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया में था .......मनन चिंतन का विषय है .

भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया की जीवनी

        भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर 1860 को हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। पिता संस्कृत के विद्वान थे। विश्वेश्वरैया ने प्रारंभिक शिक्षा जन्म स्थान से ही पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बंगलूर के सेंट्रल कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन यहां उनके पास धन का अभाव था। अत: उन्हें टयूशन करना पड़ा। विश्वेश्वरैया ने 1881 में बीए की परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया। इसके बाद मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। 1883 की एलसीई व एफसीई (वर्तमान समय की बीई उपाधि) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके अपनी योग्यता का परिचय दिया। इसी उपलब्धि के चलते महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया।

        दक्षिण भारत के मैसूर, कर्र्नाटक को एक विकसित एवं समृद्धशाली क्षेत्र बनाने में भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया का अभूतपूर्व योगदान है। तकरीबन 55 वर्ष पहले जब देश स्वंतत्र नहीं था, तब कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर समेत अन्य कई महान उपलब्धियां एमवी ने कड़े प्रयास से ही संभव हो पाई। इसीलिए इन्हें कर्नाटक का भगीरथ भी कहते हैं। जब वह केवल 32 वर्ष के थे, उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी की पूर्ति भेजने का प्लान तैयार किया जो सभी इंजीनियरों को पसंद आया। सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिए समिति बनाई। इसके लिए भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया ने एक नए ब्लॉक सिस्टम को ईजाद किया। उन्होंने स्टील के दरवाजे बनाए जो कि बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करता था। उनके इस सिस्टम की प्रशंसा ब्रिटिश अधिकारियों ने मुक्तकंठ से की। आज यह प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है। विश्वेश्वरैया ने मूसा व इसा नामक दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी प्लान तैयार किए। इसके बाद उन्हें मैसूर का चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया।

        उस वक्तराज्य की हालत काफी बदतर थी। विश्वेश्वरैया लोगों की आधारभूत समस्याओं जैसे अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी आदि को लेकर भी चिंतित थे। फैक्टरियों का अभाव, सिंचाई के लिए वर्षा जल पर निर्भरता तथा खेती के पारंपरिक साधनों के प्रयोग के कारण समस्याएं जस की तस थीं। इन समस्याओं के समाधान के लिए विश्वेश्वरैया ने इकॉनोमिक कॉन्फ्रेंस के गठन का सुझाव दिया। मैसूर के कृष्ण राजसागर बांध का निर्माण कराया। कृष्णराजसागर बांध के निर्माण के दौरान देश में सीमेंट नहीं बनता था, इसके लिए इंजीनियरों ने मोर्टार तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था। 1912 में विश्वेश्वरैया को मैसूर के महाराजा ने दीवान यानी मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया।
विश्वेश्वरैया शिक्षा की महत्ता को भलीभांति समझते थे। लोगों की गरीबी व कठिनाइयों का मुख्य कारण वह अशिक्षा को मानते थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में मैसूर राज्य में स्कूलों की संख्या को 4,500 से बढ़ाकर 10,500 कर दिया। इसके साथ ही विद्यार्थियों की संख्या भी 1,40,000 से 3,66,000 तक पहुंच गई। मैसूर में लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल तथा पहला फ‌र्स्ट ग्रेड कॉलेज (महारानी कॉलेज) खुलवाने का श्रेय भी विश्वेश्वरैया को ही जाता है। उन दिनों मैसूर के सभी कॉलेज मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध थे। उनके ही अथक प्रयासों के चलते मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई जो देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है। इसके अलावा उन्होंने श्रेष्ठ छात्रों को अध्ययन करने के लिए विदेश जाने हेतु छात्रवृत्ति की भी व्यवस्था की। उन्होंने कई कृषि, इंजीनियरिंग व औद्योगिक कालेजों को भी खुलवाया।
        वह उद्योग को देश की जान मानते थे, इसीलिए उन्होंने पहले से मौजूद उद्योगों जैसे सिल्क, संदल, मेटल, स्टील आदि को जापान व इटली के विशेषज्ञों की मदद से और अधिक विकसित किया। धन की जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने बैंक ऑफ मैसूर खुलवाया। इस धन का उपयोग उद्योग-धंधों को विकसित करने में किया जाने लगा। 1918 में विश्वेश्वरैया दीवान पद से सेवानिवृत्त हो गए। औरों से अलग विश्वेश्वरैया ने 44 वर्ष तक और सक्रिय रहकर देश की सेवा की। सेवानिवृत्ति के दस वर्ष बाद भद्रा नदी में बाढ़ आ जाने से भद्रावती स्टील फैक्ट्री बंद हो गई। फैक्ट्री के जनरल मैनेजर जो एक अमेरिकन थे, ने स्थिति बहाल होने में छह महीने का वक्त मांगा। जोकि विश्वेश्वरैया को बहुत अधिक लगा। उन्होंने उस व्यक्ति को तुरंत हटाकर भारतीय इंजीनियरों को प्रशिक्षित कर तमाम विदेशी इंजीनियरों की जगह नियुक्त कर दिया। मैसूर में ऑटोमोबाइल तथा एयरक्राफ्ट फैक्टरी की शुरूआत करने का सपना मन में संजोए विश्वेश्वरैया ने 1935 में इस दिशा में कार्य शुरू किया। बंगलूर स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स तथा मुंबई की प्रीमियर ऑटोमोबाइल फैक्टरी उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। 1947 में वह आल इंडिया मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। उड़ीसा की नदियों की बाढ़ की समस्या से निजात पाने के लिए उन्होंने एक रिपोर्ट पेश की। इसी रिपोर्ट के आधार पर हीराकुंड तथा अन्य कई बांधों का निर्माण हुआ।
        वह किसी भी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने में विश्वास करते थे। 1928 में पहली बार रूस ने इस बात की महत्ता को समझते हुए प्रथम पंचवर्षीय योजना तैयार की थी। लेकिन विश्वेश्वरैया ने आठ वर्ष पहले ही 1920 में अपनी किताब रिकंस्ट्रक्टिंग इंडिया में इस तथ्य पर जोर दिया था। इसके अलावा 1935 में प्लान्ड इकॉनामी फॉर इंडिया भी लिखी। मजे की बात यह है कि 98 वर्ष की उम्र में भी वह प्लानिंग पर एक किताब लिख रहे थे। देश की सेवा ही विश्वेश्वरैया की तपस्या थी। 1955 में उनकी अभूतपूर्व तथा जनहितकारी उपलब्धियों के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। जब वह 100 वर्ष के हुए तो भारत सरकार ने डाक टिकट जारी कर उनके सम्मान को और बढ़ाया। 101 वर्ष की दीर्घायु में 14 अप्रैल 1962 को उनका स्वर्गवास हो गया। 1952 में वह पटना गंगा नदी पर पुल निर्माण की योजना के संबंध में गए। उस समय उनकी आयु 92 थी। तपती धूप थी और साइट पर कार से जाना संभव नहीं था। इसके बावजूद वह साइट पर पैदल ही गए और लोगों को हैरत में डाल दिया। विश्वेश्वरैया ईमानदारी, त्याग, मेहनत इत्यादि जैसे सद्गुणों से संपन्न थे। उनका कहना था, कार्य जो भी हो लेकिन वह इस ढंग से किया गया हो कि वह दूसरों के कार्य से श्रेष्ठ हो।
उनकी जीवनी हमारे लिये प्रेरणा है

13 सितंबर, 2014

कार्पोरेट जगत , युवा वर्ग और राष्ट्र भाषा हिन्दी

कार्पोरेट जगत ,  युवा वर्ग और राष्ट्र भाषा हिन्दी 

विवेक रंजन  श्रीवास्तव ‘विनम्र
अतिरिक्त अधीक्षण इंजीनियर
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर (मप्र) 482008
मो. 9425806252

हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है, पर प्रश्न है कि क्या सचमुच ही हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा बन पाई है ? इस यक्ष प्रश्न को अनुत्तरित छोड देने में विगत पीढी के उन राजनेताओं की बहुत बडी गलती है, जिसके अनुसार हमारी संसद ने यह विधेयक पारित कर दिया कि जब तक देश का एक भी राज्य हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार करने में अपनी तैयारी या अन्य कारणो से असमर्थता व्यक्त करें, तब तक हिंदी को अनिवार्य नहीं किया जावेगा। यही कारण है कि क्षेत्रवाद, भाषाई राजनीति, पक्ष, विपक्ष के चलते कानूनी रूप से हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा के रूप में आजादी के पैसठ वर्षों बाद भी स्थापित नहीं हो पाई।
लोकतंत्र में कानून से उपर जन भावनायें होती है, विगत कुछ दशकों में बाजारवाद विश्व पर हावी हुआ है आज का युवावर्ग इसी बाजारवाद से प्रभावित है, जहां आजादी के दिनों में उत्सर्ग, देश के लिये समर्पण और त्याग की भावनायें युवाओं को आकृष्ट कर रही थी, वहीं वर्तमान समय में स्वंय की आर्थिक उन्नति, बढती आबादी के दबाव के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा में येन केन प्रकारेण आगे निकलने की होड में युवा सतत व्यस्त है। आज कार्पोरेट जगत में युवा शक्ति का साम्राज्य है . विभिन्न कंपनियो के शिर्ष पदो पर अधिकांशतः युवा ही पदारूढ़ हैं . बाजार वैश्विक हो चला है . अंग्रेजी वैश्विक संपर्क भाषा के रूप में स्थापित  हो चुकी है, अतः आज युवावर्ग ने मातृभाषा हिन्दी की अपेक्षा अंग्रेजी को प्राथमिकता देते हुये अपनी अभिव्यक्ति व संपर्क का माध्यम बनाया है, त्रिभाषा फार्मूले के शीर्ष पर अंग्रेजी स्थापित होती दिख रही है। आंकडो में देखे तो हिन्दी का विस्तार हो रहा है, नई पत्र पत्रिकायें, किताबें, हिन्दी बोलने वालो की संख्या, विश्वविद्यालयों में हिन्दी पाठ्यक्रम ,  सब कुछ बढ रहा है। पर वास्तविकता से परिचित होने की जरूरत है, जर्मन रेडियो डायचेवेली ने हिन्दी प्रसारण बंद कर दिया है। बीबीसी अपने हिन्दी प्रसारण अप्रैल 2011 से बंद करने वाला है। हिंदी पुस्तको के प्रथम संस्करणों में 200 से 250 प्रतियां ही छप रही है। हिंदी लेखकों को कोई उल्लेखनीय रायल्टी नहीं मिल रही है। हिदीं ‘हिन्गलिश‘ बन रही है। मोबाईल पर एस.एम.एस हो या नेटवर्किग साइट पर युवा वर्ग की चैटिंग, रेडियो जाकी की एफ.एम. रेडियो पर उद्घोषणायें  हो या टीवी के युवाओ में लोकप्रिय कार्यक्रम, शुद्ध हिंदी मिलना दुष्कर है.गांव गांव तक हमारी फिल्मो व फिल्मी गीतो का युवा वर्ग पर विशेष प्रभाव है , अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी शीर्षक की फिल्में , उनके डायलाग तथा हिन्दी व्याकरण को ठेंगा बताती शब्दावली के फिल्मी गीत अपनी तेज संगीत वाली धुनो के कारण युवाओ में लोकप्रिय हैं . आशा की किरण यही है कि यह सब जो कुछ भी है देवनागरी में है , सकारात्मक ढ़ंग से देखें तो इस तरह भी हिन्दी देश को जोड़  रही है, तथा विश्व में हिन्दी को स्थान भी दिला रही हैं .कार्पोरेट जगत के एम बी ए पढ़े लिखे युवा भले ही अंग्रेजी में गिटर पिटर करें या कार्पोरेट जगत का आंतरिक पत्र व्यवहार , प्रगति प्रतिवेदन आदि भले ही अंग्रेजी में हो पर जब वे अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करते हैं तो  उन्हें विज्ञापनो में हिन्दी का ही  सहारा लेना पड़ता है , यह और बात है कि यह हिन्दी भी विशुद्ध न होकर जन बोलौ  ही होती है. 
 हिंदी कविताओं की पुस्तके छपती है, पर वे विजिटिंग कार्ड की तरह बांटी जाने को विवश है, एवं लेखकीय आत्ममुग्धता से अधिक नहीं है। युगांतकारी रचना धार्मिता का युवा हिन्दी लेखको, कवियो में अभाव दिख रहा है। देश की आजादी के समय मिशन स्कूल, पब्लिक स्कूल एवं कावेंट स्कूलो के पास जो संस्थागत ताकत शिक्षण के क्षेत्र में थी, उसका हिंदी के विपरीत समाज पर स्पष्ट दुष्प्रभाव अब परिलक्षित हो रहा है । शिक्षा, रोजगार का साधन बनी, व्यक्ति की संस्कारों या सच्चे ज्ञान की वाहक अपेक्षाकृत कम रह गयी . रोजगार तथा बच्चो के सुखद आर्थिक भविष्य के  दृष्टिकोण से स्वंय हिन्दी के समर्थक पालको ने भी अपने बच्चो को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने में ही भलाई समझी इसके परिणाम स्वरूप आज की अंग्रेजी माध्यम से पढी पीढी सत्रह, इकतीस या उननचास नहीं समझ पाती, उसे सेवेनटीन, थर्टीवन और फोर्टीनाइन बतलाना पडता है , यह पीढ़ी अंग्रेजी में सोचकर भले ही हिंदी में लिख ले पर वह हिन्दी के संस्कारो से जुड़ नही पाई है . 
किंतु सब कुछ निराशाजनक ही नहीं है, एटीएम मशीन हो, या कम्पयूटर के साफ्टवेयर अंग्रेजी के साथ हिंदी के विकल्प भी अब  सुलभ है, हिंदी शिक्षण हेतु नेट पर कक्षायें भी चल रही है, हिंदी ब्लाग प्रजातंत्र के पांचवे स्तंभ के रूप में स्थापित हो चला है,नित नये हिन्दी ब्लाग्स विविध विषयो पर देखने को मिल रहे हैं .  यह सब हमारा युवा वर्ग ही कर रहा है, हिंदी में शोध करने वाले आज भी गंभीर कार्य कर रहे है, इसके दीर्घकालिक प्रभाव देखने को जरूर मिलेगें। आने वाले समय में आज का युवा ही हिंदी को किसी कानून के कारण नहीं, या उपर से थोपे स्वरूप में नहीं वरन् स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के बीच , अंतरमन से हिंदी की सरलता, सहजता के कारण तथा हिन्दी के भातर की जनभाषा होने के कारण  व्यापक स्वरूप में अपनायेगा, हमारी पीढी इसी आशा और विश्वास के साथ हिंदी को बढ़ता देखना चाहती है।

vivek ranjan shrivastava