10 मार्च, 2012

प्रदेश की पहली निजी ताप बिजली ७ मार्च को विद्युत मंडल के तंत्र में .....

प्रदेश की पहली निजी ताप बिजली ७ मार्च को विद्युत मंडल के तंत्र में .....

गाडरवारा में बीएलए ग्रुप द्वारा ४५ मेगावाट क्षमता वाली दो यूनिटो की स्थापना की जा रही है। इसमें से एक यूनिट ने बिजली उत्पादन प्रारंभ कर दिया है। ७ मार्च को इस यूनिट से उत्पादित बिजली विद्युत मंडल के पारेषण सिस्टम के जरिये वितरणके लिये उपलब्ध की गई . बीएलए ने अपने पावर प्लांट से उत्पादित बिजली में ३३ फीसदी बिजली प्रदेश को देने का करार किया है। विद्युत मंडल के सचिव और पावर ट्रेडिंग कंपनी के एमडी पीके वैश्य ने इस बात की पुष्टि की कि गाडरवारा निजी प्लांट से उत्पादित बिजली हमारे सिस्टम में दी गई . उन्होंने बताया कि अभी बिजली उत्पादन की टेस्टिंग चल रही है। पूर्ण रूप से बिजली मिलने में लगभग एक माह का समय लगेगा।

ओबामा ने 30 साल बाद पहली बार नया रिएक्टर बनाने की अनुमति दी

जापान में परमाणु हादसे के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 30 साल बाद पहली बार नया रिएक्टर बनाने की अनुमति दी है. जॉर्जिया राज्य में 14 अरब डॉलर के दो नए रिएक्टर बनेंगे. लेकिन फिर भी परमाणु ऊर्जा पर आशंका बढ़ी है.

अमेरिका में ही नहीं, भारत सहित एशिया के दूसरे बड़े देश भी परमाणु तकनीक में बड़ी दिलचस्पी ले रहे हैं. ऊर्जा की तेजी से बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए भारत और चीन अगले सालों में दर्जनों परमाणु रिएक्टर बनाएंगे. जापान में परमाणु हादसे के बावजूद इन सरकारों की सोच में कोई बदलाव नहीं आया है. कई देश जिन्होंने पहले कभी परमाणु ऊर्जा के बारे में नहीं सोचा था, अब धीरे धीरे उसकी तरफ बढ़ रहे हैं.

बिजली के लिए पोलैंड अब तक कोयले पर निर्भर था, लेकिन अब परमाणु ऊर्जा उसे आकर्षक लग रही है. जब जर्मनी ने 2028 तक परमाणु ऊर्जा पर निर्भरता खत्म करने का फैसला लिया, तो पोलैंड के प्रधानमंत्री ने कहा, "जिसे परमाणु रिएक्टर नहीं बनाना है, वह उसकी समस्या है. हम इस बीच पूरा विश्वास करते हैं कि परमाणु ऊर्जा एक अच्छा विकल्प है, जहां तक ऊर्जा पैदा करने का सवाल है."

लेकिन पोलैंड की योजना कब तक और कैसे पूरी होगी, यह पता नहीं चला है. बर्लिन में पर्यावरण वैज्ञानिक लुत्स मेत्स कहते हैं कि पोलैंड को इस दिशा में बहुत तैयारी करनी है. क्योंकि देश में परमाणु ऊर्जा के लिए विश्लेषक नहीं है जो रिक्टर चला सकें. साथ ही सरकारी लाइसेंस और नियंत्रण के लिए भी लोग मौजूद नहीं है. वे कहते हैं कि इस तरह की संस्था बनाने में ही 15 साल लग जाते हैं और योजना और उम्मीद का मतलब नहीं है कि प्रॉजेक्ट सच में चलने लगेगा.


पहले की तरह अब भी ऐसे देश हैं जो भविष्य में बिजली के लिए परमाणु ऊर्जा पर निर्भर होंगे. लेकिन यूरोपीय संसद में परमाणु राजनीतिज्ञ रेबेका हार्म्स का मानना है कि परमाणु रिएक्टरों की संख्या में औसतन कमी आएगी. डॉयचे वेले से इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि लोग इससे पीछे हट रहे हैं. अगले दशकों में नए रिएक्टर बनेंगे, लेकिन 2030 से 2035 तक इनमें कमी आएगी.

लुत्स मेत्स का भी यही मानना है. फ्रांस में यूरोप के सबसे ज्यादा परमाणु रिएक्टर हैं, लेकिन वहां भी सोच बदल रही है. खास कर इसलिए कि ऊर्जा की जरूरत चढ़ती और गिरती रहती है जिसकी वजह से ऐसे रिएक्टरों की जरूरत है जिन्हें चलाया और फिर आसानी से बंद किया जा सके. परमाणु रिएक्टरों में ऐसा करना संभव नहीं है. लुत्स कहते हैं, "मिसाल के तौर पर, काम खत्म होने के बाद जब लोग घर जाते हैं तो बिजली का इस्तेमाल ज्यादा होता है. यह आप नहीं रोक सकते."

अगले कुछ हफ्तों में फ्रांस में नए राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा है. निकोला सारकोजी को चुनौती दे रहे फ्रांसोआ ओलांद चाहते हैं कि देश में बिजली की खपत 75 से 50 प्रतिशत कम होगी. चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक जर्मनी की सरहद पर फेसेनहाइम के रिएक्टर को बंद करने की बात कही जा रही है.


विकासशील देशों की हालांकि परेशानी कुछ और ही है. हर साल चीन को 60,000 मेगावॉट बिजली के लिए नए रिएक्टर बनाने पड़ते हैं ताकि वह अपने विकास को बनाए रखे. लुत्स मानते हैं कि इन हालात में परमाणु ऊर्जा की भूमिका कम है. चीन हर साल 500 मेगावॉट का कोयला वाला रिएक्टर बनाता है और पिछले कुछ सालों में नवीनीकृत ऊर्जा का भी इस्तेमाल कर रहा है. चीन में परमाणु ऊर्जा देश की केवल दो प्रतिशत जरूरतों को पूरा करता है. भारत में भी यही हालत है. फ्रांस में बिजली की ज्यादा खपत है क्योंकि देश भर में सर्दी से बचने के लिए चल रहे हीटर बिजली से चलते हैं.

परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा तो एक बात है, लेकिन इससे बड़ी परेशानी इन्हें बनाने के लिए पैसा लाना है. एक गैस रिएक्टर में परमाणु रिएक्टर के मुकाबले दस गुना कम पैसा लगता है. एक परमाणु रिएक्टर बनाने का दाम, रिबेका हार्म्स के मुताबिक सात अरब यूरो यानि 450 अरब रुपए है. जर्मनी के लोअर सेक्सनी राज्य में आसे परमाणु रिएक्टर से निकला कचरा जमीन में घुसकर वहां पानी को खराब कर रहा है. इसे साफ करने में हजारों साल लगेंगे. मेत्स कहते हैं कि इस तरह का निवेश करने का मतलब है कि सालों साल इसमें पैसे लगते रहेंगे. अब भी परमाणु कचरे को सुरक्षित रखने का कोई तरीका नहीं मिल पाया है और पुराने रिएक्टरों को खत्म करने की तकनीक भी विकसित नहीं की गई है.

1974 में ही अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी ने कहा था कि 2000 तक परमाणु रिएक्टरों से 4,500 गीगावॉट बिजली निकलेगी. 2010 तक यह संख्या हालांकि केवल 375 गीगावॉट रही और भविष्य में इसके और कम होने की संभावना है.

27 फ़रवरी, 2012

कोर्ट को पेंशन के परिप्रेक्ष्य में मप्र विद्युत नियामक आयोग के समक्ष प्रकरण विचाराधीन होने की जानकारी

SABHAR .......NAIDUNIA 28.02.2012

हाईकोर्ट के जस्टिस आरएस झा की एकलपीठ ने मध्यप्रदेश राज्य विद्युत मंडल को कंपनी विकल्प चयन मामले में पूर्व निर्देश के परिपालन में हलफिया प्रगति प्रतिवेदन पेश करने निर्देशित किया है। इसके लिए दो सप्ताह की मोहलत दी गई है।

निर्देश का पालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी महाधिवक्ता आरडी जैन को सौंपी गई है। विगत सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मप्रराविमं को अस्थाई सूची (टेंटेटिव लिस्ट) जारी करने स्वतंत्र कर दिया था। हालांकि आगे की कार्रवाई को अंतिम रूप दिए जाने पर रोक बरकरार रखी गई थी। इस प्रक्रिया को सम्पन्न करने के लिए चार सप्ताह की समय-सीमा नियत करते हुए मामले की अगली सुनवाई २७ फरवरी को नियत की गई थी।

मामला मध्यप्रदेश विद्युत मंडल अभियंता संघ की याचिका से संबंधित है, जिसकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वीएस श्रोती पक्ष प्रवर्तित कर रहे हैं। राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता नमन नागरथ व मध्यप्रदेश राज्य विद्युत मंडल की ओर से अधिवक्ता स्वप्निल गांगुली पैरोकार हैं।

कोर्ट ने विगत सुनवाई के दौरान राज्य शासन द्वारा १८ जनवरी २०१२ को प्रस्तुत किए गए हलफनामे को रिकॉर्ड पर लिया था। जिसके जरिए मंडल के ४७ हजार कर्मियों के ६ कंपनियों के मध्य प्रस्तावित वितरण के संबंध में जानकारी पेश की गई थी। कोर्ट को कंपनियों के विकल्प चयन के मामले में लंबित १८०२ आवेदनों के बारे में भी अवगत कराया गया। ये वे कर्मचारी हैं जिनकी ओर से कंपनी का विकल्प भर दिया गया है। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त महाधिवक्ता नमन नागरथ ने तर्क दिया था कि कोर्ट के पूर्व स्थगनादेश के कारण कर्मचारियों के कंपनियों में आवंटन की योजना अधर में लटकी हुई है। याचिकाकर्ता की मांग है कि जब तक कर्मियों की पेंशन आदि सेवा शर्त संबंधी जिम्मेदारी का निर्धारण नहीं हो जाता कंपनियों में आवंटन नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि इसके बावजूद वस्तुस्थिति यह है कि सरकार २००३ से ही अपनी प्रक्रिया जारी रखे हुए है लेकिन कोर्ट से स्टे के कारण प्रक्रिया अंतिम रूप नहीं ले पा रही है। इसके चलते अंततः नुकसान कर्मियों का ही हो रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि ४७ हजार कर्मियों के नियुक्ति व पदोन्नति सहित अन्य तरह के हित बाधित हो रहे हैं।इधर कंपनियां सीधी भर्ती के तहत पद भर रही हैं जिससे मप्रराविमं कर्मियों के प्रमोशन के हक पर कुठाराघात हो रहा है। ऐसे में कंपनी संबंधी विकल्पों की सूची जारी करना कर्मियों के हित में होगा। लिहाजा, व्यापक हित में रोक हटाने योग्य है। कोर्ट ने इस तर्क को शर्त के साथ मंजूर कर लिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट को पेंशन के परिप्रेक्ष्य में मप्र विद्युत नियामक आयोग के समक्ष प्रकरण विचाराधीन होने की जानकारी भी दी गई, जिसे रिकॉर्ड पर ले लिया गया।

26 फ़रवरी, 2012

घाटे वाले इलाकों में मिलेगी ज्यादा महंगी बिजली !

घाटे वाले इलाकों में मिलेगी ज्यादा महंगी बिजली
प्रदेश में दो बिजली दरें!

शुंगलू कमेटी की अनुशंसा पर गंभीरता से विचार


मध्यप्रदेश में इस साल एक साथ दो बिजली टैरिफ (दरें) लागू किए जा सकते हैं। इस संबंध में शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट पर गंभीरता से विचार हो रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक घाटे वाले इलाकों में महंगी बिजली देने का सुझाव है। इस पर अमल हुआ तो पड़ोसी कॉलोनियों में भी बिजली की अलग-अलग दरें होंगी। मसलन, एक सामान्य टैरिफ होगा और दूसरा घाटा देने वाले इलाकों में महंगी बिजली का टैरिफ होगा। महंगी दर वाले इलाकों में ७० फीसद शहरी इलाके होंगे। ऐसा करने पर दोहरी बिजली दर लागू करने वाला मप्र देश का पहला राज्य होगा। फिलहाल प्रदेश की तीनों वितरण कंपनियां हाई लॉस वाले इलाकों में ज्यादा बिजली कटौती कर रही हैं।

राज्य में बिजली की नई दरें तय करने जनसुनवाई अंतिम दौर में है। ऐसे में देश के पूर्व सीएजी वीके शुंगलू की अध्यक्षता में बिजली वितरण की आर्थिक स्थिति पर अध्ययन करने के लिए बनी नौ सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट पर विचार मंथन शुरू हो गया है। यह रिपोर्ट पिछले दिनों ही आई है। शुंगलू कमेटी ने अनुशंसा की है कि घाटे वाले इलाकों में महंगी बिजली दी जाए।

शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक बिजली कंपनियों का घाटा वास्तविक है। इसलिए उसे दूर करना जरूरी है, अन्यथा बिजली कंपनियां अधिक समय तक नहीं चल सकेंगी। अभी बिजली नियामक आयोग उनके वास्तविक घाटे को उतनी तवज्जो नहीं दे रहा है। लेकिन इसका बोझ सब पर नहीं डाला जा सकता। इसलिए जिन इलाकों में बिजली कंपनियों को ज्यादा घाटा है, वहां पर बिजली अधिक महंगी कर देना चाहिए। नियामक आयोग को उन इलाकों के लिए अलग से महंगा टैरिफ देना चाहिए। शुंगलू कमेटी को भारत सरकार के स्तर पर मध्यप्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में बिजली के घाटे की स्थिति पर अध्ययन के लिए बनाया गया था।शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट में घाटे वाले बिजली फीडरों पर अलग से दर रखने के लिए कहा गया है। आयोग की प्राथमिकता में कमेटी की रिपोर्ट है, लेकिन अभी उस पर अमल बाकी है।

मध्यप्रदेश में इस साल एक साथ दो बिजली टैरिफ (दरें) लागू किए जा सकते हैं। इस संबंध में शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट पर गंभीरता से विचार हो रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक घाटे वाले इलाकों में महंगी बिजली देने का सुझाव है। इस पर अमल हुआ तो पड़ोसी कॉलोनियों में भी बिजली की अलग-अलग दरें होंगी। मसलन, एक सामान्य टैरिफ होगा और दूसरा घाटा देने वाले इलाकों में महंगी बिजली का टैरिफ होगा। महंगी दर वाले इलाकों में ७० फीसद शहरी इलाके होंगे। ऐसा करने पर दोहरी बिजली दर लागू करने वाला मप्र देश का पहला राज्य होगा। फिलहाल प्रदेश की तीनों वितरण कंपनियां हाई लॉस वाले इलाकों में ज्यादा बिजली कटौती कर रही हैं।

राज्य में बिजली की नई दरें तय करने जनसुनवाई अंतिम दौर में है। ऐसे में देश के पूर्व सीएजी वीके शुंगलू की अध्यक्षता में बिजली वितरण की आर्थिक स्थिति पर अध्ययन करने के लिए बनी नौ सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट पर विचार मंथन शुरू हो गया है। यह रिपोर्ट पिछले दिनों ही आई है। शुंगलू कमेटी ने अनुशंसा की है कि घाटे वाले इलाकों में महंगी बिजली दी जाए।

25 फ़रवरी, 2012

फोटोवोल्टाइक विद्युत

सौर फोटोवोल्टाइक विद्युत

डॉ. चेतनसिंह सोलंकी

सौर फोटोवोल्टाइक तकनीक, सौर फोटोवोल्टाइक या पीवी मॉड्यूल्स के उत्पादन की तकनीक है। एक सौर पीवी मॉड्यूल में आधारभूत घटक एक सौर पीवी सेल होता है। एक सौर पीवी सेल में वोल्टेज तब उत्पादित होता है जब इस पर सूर्य प्रकाश गिरता है। यह प्रभाव फोटोवोल्टाइक प्रभाव कहलाता है। सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में एक पीवी सेल एक बैटरी की तरह होता है। एक बैटरी के समान, जब आप पीवी सेल को सर्किट से जोड़ते हैं, तब सर्किट में विद्युतधारा का प्रवाह होता है। परंतु जब सौर पीवी सेल पर प्रकाश बिल्कुल नहीं गिरता है, तब इसके सिरों पर कोई वोल्टेज उत्पादित नहीं होता है, कोई विद्युतधारा प्रवाहित नहीं होती व शक्ति या पावर उत्पादित नहीं होती।

उचित दक्षता युक्त प्रथम सौर सेल वर्ष १९५४ में निर्मित किया गया था। उस समय सेल की दक्षता लगभग ५ प्रतिशत थी। इस ५ प्रतिशत दक्षता को प्राप्त करने के पश्चात्‌ लोगों ने सोचना पहली बार शुरू किया कि वास्तव में सौर सेल को उपयोगी विद्युत के उत्पादन हेतु उपयोग किया जा सकता है। उस वक्त, सौर सेल की बहुत अधिक कीमत के कारण, वैज्ञानिक मुख्यतः अंतरिक्ष प्रयोगों हेतु सेल निर्मित कर रहे थे, अंतरिक्ष यान को पावर देने हेतु। परंतु १९७३ में जब, क्रूड तेल की कीमत अकल्पनीय रूप से बढ़ी, पूरी दुनिया सदमे में थी, यह पहला ऑइल-शॉक या तेल का सदमा कहलाया, और तभी पूरी दुनिया की सरकारों ने ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों के उत्पादन को बढ़ावा देना प्रारंभ किया। परिणामस्वरूप, सौर सेल के उत्पादन व अनुसंधान को प्रोत्साहन मिला। आज बहुत अधिक दक्षता वाले सौर सेल उत्पादित होते हैं। सौर सेल का उत्पादन १९७३ के कुछ हजार वॉट से अप्रत्याशित रूप से लगभग ३०,०००,०००,००० वॉट या ३० गीगा वॉट वर्ष २०११ में तक बढ़ गया है।

एक सौर सेल शक्ति या पावर की बहुत अधिक मात्रा उत्पादित नहीं कर सकता। अतः एक पीवी मॉड्यूल में, अधिक पॉवर प्राप्त करने हेतु अनेक सौर सेल आपस में जुड़े होते हैं। आजकल विभिन्ना पावर रेटिंग वाले पीवी मॉड्यूल उपलब्ध हैं। आप एक बहुत निम्न जैसे १ वॉट पावर मॉड्यूल से लेकर बहुत अधिक जैसे ३०० वॉट पावर वाले मॉड्यूल खरीद सकते हैं। अनेकों अधिक पावर आवश्यकता वाले अनुप्रयोगों में, कई बार ३०० वाट वाले पीवी मॉड्यूल भी पर्याप्त नहीं होते हैं, उदाहरण के लिए जब आप १ मेगावॉट पीवी प्लांट की स्थापना कर रहे हों, अतः अधिक पावर प्राप्त करने के लिए कई मॉड्यूल को आपस में जोड़ा जाता है। अनेक मॉड्यूल्स का आपस में संयोजन पीवी श्रेणी कहलाता है।

वर्तमान समय में पारंपरिक ग्रिड विद्युत की तुलना में सौर पीवी विद्युत महँगी है। सौर सेल में अभी उपयोग किया जाने वाला मुख्य घटक सिलिकॉन है। पूरी दुनिया में उत्पादित होने वाले सौर सेल का लगभग ८५ प्रतिशत सौर सेल उत्पादन सिलिकॉन का उपयोग कर होता है। सिलिकॉन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है परंतु इसे सौर सेल के लिये उपर्युक्त बनाने हेतु इसके शु़िद्धकरण में लगने वाली कीमत इसे बहुत महँगा बना देती है। सिलिकॉन व सौर सेल के उच्च मूल्य के कारण, बहुत अधिक संख्या में अनुसंधान संस्थान व कंपनियाँ सौर पीवी मॉड्यूल के मूल्य को कम करने के लिए साथ में काम कर रहे हैं। कीमत कम करने के लिए लक्ष्य है पीवी मॉड्यूल के समान क्षेत्र से अधिक पावर प्राप्त करने के नए तरीके ढूँढना या विभिन्ना प्रकार की सस्ती सामग्रियों को ज्ञात करना, जो कि सौर पीवी विद्युत उत्पादन के लिए उपयोग की जा सकें।

वैकल्पिक सामग्रियों की खोज की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। अतः आज सिलिकॉन के अतिरिक्त, अन्य सामग्रियों से बने सौर पीवी मॉड्यूल्स भी खरीदे जा सकते हैं। व्यावसायिक रूप से उपलब्ध अन्य सौर पीवी तकनीकें कैडमियम टेल्यूराइड, कॉपर-इंडियम-सेलेनाइड एवं गैलियम आर्सेनाइड आदि सामग्रियों का उपयोग कर बनी हैं। इनके अतिरिक्त, लगभग २० से ३० अन्य नई सामग्रियाँ हैं एवं सामग्रियों के अन्य संयोजन भी हैं जिनसे सस्ते सौर सेल व पीवी मॉड्यूल्स बनाने हेतु अनुसंधान किया गया है। यह अपेक्षित है कि २ से ५ वर्ष के समयांतराल में सौर पीवी विद्युत की कीमत घटकर उस स्तर तक आ जाएगी जहाँ इसकी पारंपरिक कोयला आधारित विद्युत के मूल्य से इसकी तुलना की जा सकेगी।

(लेखक आईआईटी, मुंबई में एसोसिएट प्रोफेसर हैं और सौर ऊर्जा पर शोध कर रहे हैं)

19 फ़रवरी, 2012

३ प्रतिशत पर ही अटका है परमाणु बिजली उत्पादन

३ प्रतिशत पर ही अटका है बिजली उत्पादन : बनर्जी
लक्ष्य से बहुत पीछे है परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम

इंदौर(ब्यूरो)। भारत का परमाणु बिजली कार्यक्रम अपने लक्ष्य से कुछ पीछे चल रहा है। देश के २० रिएक्टरों से कुल ४७८० मेगावॉट बिजली बन रही जो कुल बिजली का ३ प्रतिशत है। कुडनकुलम परियोजना का निर्धारित समय में पूरा न होना भी इसका एक कारण है।

यह बात परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष एवं परमाणु ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष श्रीकुमार बेनर्जी ने यहाँ पत्रकार वार्ता में दी। आपने जोर देकर कहा किप्रतिशत के मान से हम भले ही पीछे हों लेकिन भारत का परमाणु बिजली कार्यक्रम पूरी तरह सुरक्षित व बेहतर है। हम नाभिकीय टेक्नालॉजी में पूरा सामर्थ्य रखते हैं।

मध्य प्रदेश में परमाणु बिजली घर बनाने के प्रश्न पर आपने कहा कि यहाँ संभावनाएँ प्रबल हैं । चुटका (जिला सीवनी) के बाद एक और स्थान की तलाश जारी है। बेहतर संभावनाओं की वजह बताते हुए आपने कहा कि मप्र में एक तो आबादी बिखरी हुई है और भूमि सुलभ है। केवल भूमि हस्तातंरण के नियम पुख्ता नहीं होने से परेशानी आती है। आपने कहा कि परमाणु बिजलीघर के लिए हम कृषि भूमि को लेना स्वीकार नहीं करते । बंजर जमीन हमारे लिए अच्छी होती है। जापान में बंद होने जा रहे परमाणु संयंत्रों पर उठे सवाल के जवाब में श्री बेनर्जी ने कहा कि परकाणु बिजली संयंत्र क्यों बंद होना चाहिए? हमारे यहाँ बंद होने का सवाल ही नहीं उठता। योरप व अमेरिका नए प्लांट इसलिए नहीं डाल रहे हैं क्योंकि वहाँ बिजली पर्याप्त है। हमारे यहाँ बिजली की कमी है। आपने बताया कि हमारे सभी रिएक्टरों का हमने सेफ्टी एनालिसिस फ्रांस के विशेषज्ञों से कराया है जिसकी रिपोर्ट हमें मिल चुकी है। हमने अपने स्तर पर भी सर्वे किया है। दोनों के आधार पर हम यह कहने की स्थिति मे हैं कि हमारा परमाणु बिजली कायक्रम सुरक्षित व बेहतर है।

18 फ़रवरी, 2012

innovative GUJRAT

solar panels on canal

पेंशन के लिए बनेगा रेग्युलेशन

पेंशन के लिए बनेगा रेग्युलेशन

विद्युत मंडल के अधिकारियों- कर्मचारियों की पेंशन के लिए पृथक से रेग्युलेशन बनाया जाएगा। इस संबंध में विद्युत नियामक आयोग ने विधिवत आदेश दे दिया है। रेग्युलेशन के लिए आयोग एक ड्रॉफ्ट तैयार कराएगा इसके बाद आगे की कार्रवाई होगी। आयोग के इस आदेश से जहां बिजली कंपनियों को राहत मिली है .

विद्युत नियामक आयोग ने अपने आदेश में कहा है कि विद्युत मंडल और उसकी उत्तरवर्ती कंपनियों व सेवानिवृत्त कर्मियों की पेंशन भुगतान व इससे संबंधित अन्य मुद्दों को टेरिफ रेग्युलेशन से पृथक कर एक अलग से रेग्युलेशन बनाया जाएगा। इस संबंध में नियामक आयोग ने आयोग सचिव को निर्देशित किया है कि वे उचित रेग्युलेशन तैयार कर प्रस्तुत करें।

उल्लेखनीय है कि मप्र पावर ट्रांसमिशन कंपनी, पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी, मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी, पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी, पावर जनरेशन कंपनी, पावर ट्रेडिंग कंपनी की ओर से संयुक्त रूप से कर्मियों की पेंशन व्यवस्था हेतु एक याचिका मप्र विद्युत नियामक आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई थी। कंपनियों की ओर से पैरवी दिल्ली के सीनियर एडवोकेट एमजी रामचंद्रन ने की।

08 फ़रवरी, 2012

बीना में १२०० केवी ट्रांसफॉर्मर चालू

बीना में १२०० केवी ट्रांसफॉर्मर चालू

नई दिल्ली (वा)। पूरी तरह से देश में विकसित पहले १२०० केवी के अल्ट्रा हाई वोल्टेज अल्टरनेटिंग करंट (यूएचवीएसी) ट्रांसफॉर्मर के सफलतापूर्वक काम करना शुरु कर देने के साथ ही भारत इस तरह की प्रौद्योगिकी रखने वाले विश्व के चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है। भारी बिजली उपकरण बनाने वाली सरकारी कंपनी भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) द्वारा विकसित और निर्मित इस ट्रांसफॉर्मर की मदद से मध्य प्रदेश के बीना में देश की पहली १२०० केवी ट्रांसमिशन लाइन को चालू किया गया है।