09 मई, 2008

एक कविता मेरी भी बिजली पर


बिजली

विवेक रंजन श्रीवास्तव
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ई मेल vivekranjan.vinamra@gmailcom


शक्ति स्वरूपा ,चपल चंचला ,दीप्ति स्वामिनी है बिजली ,
निराकार पर सर्व व्याप्त है , आभास दायिनी है बिजली !

मेघ प्रिया की गगन गर्जना , क्षितिज छोर से नभ तक है,
वर्षा ॠतु में प्रबल प्रकाशित , तड़ित प्रवाहिनी है बिजली !

पल भर में ही कर उजियारा , अंधकार को विगलित करती ,
हर पल बनती , तिल तिल जलती , तीव्र गामिनी है बिजली !

कभी उजाला, कभी ताप तो, कभी मशीनी ईंधन बन कर आती है,
सदा सुलभ , सेवा तत्पर है , रूप बदलती, हरदम हाजिर है बिजली !

सावधान ! चोरी से इसकी , छूने से विद्युत , दुर्घटना घट सकती है ,
मितव्ययिता से सदुपयोग हो , माँग अधिक पर , कम है बिजली !

गिरे अगर दिल पर दामिनि तो , है सचमुच , बचना मुश्किल है,
प्रिये हमारी, हम घायल हैं , रूप दमकता, अदा तुम्हारी है बिजली !

सर्वधर्म समभाव जताये , छुआछूत से हट ,घर घर तारों से जोड़े ,
एक देश है ज्यों शरीर , और नाड़ी में , रक्त वाहिनी सी बिजली !!

3 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया है जी, बिजली चोरी के खिलाफ़ सख्त कदम उठाने की जरूरत है, लेकिन कमजोर सरकारों में इच्छाशक्ति की कमी है…

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  2. बिजली पर आपका ब्लाग अच्छा है,
    स्वागत है आपका,

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  3. अच्छी कविता है. सोचा था कुछ टिपण्णी करूंगा पर आपने टिप्पणी मॉडरेशन सक्षम किया हुआ है.

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