04 अक्तूबर, 2013

प्री स्ट्रैस्ड सीमेंट कांक्रीट के बिजली के खम्भे ... निर्माण विधि ‍, परीक्षण , तथा सुधार हेतु सुझाव

प्री स्ट्रैस्ड सीमेंट कांक्रीट के बिजली के खम्भे ... निर्माण विधि ‍, परीक्षण , तथा सुधार हेतु सुझाव

विवेक रंजन श्रीवास्तव
जन संपर्क अधिकारी व अधीक्षण अभियंता सिविल , म.प्र. पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी जबलपुर
बी ई सिविल , पोस्ट ग्रेजुएट मशीन फाउण्डेशन ,डिप्लोमा इन मैनेजमेंट , सर्टीफाइड इनर्जी मैनेजर  , फैलो आफ इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स

लेखक की हिन्दी कृति "बिजली का बदलता परिदृश्य" चर्चित है . इंस्टीट्यूशन के हिन्दी जरनल , विज्ञान प्रगति , आविष्कार सहित अनेक पत्र पत्रिकाओ में हिन्दी में नियमित लेखन करते रहे हैं . सम्मानित व पुरस्कृत हुये हैं .

हमारी जानकारी में हिन्दी में पी सी सी पोल पर यह अब तक का पहला आलेख है .


विभिन्न तरह के बिजली के खम्भे ......
हमारा देश आकार में बहुत बड़ा है ,  विद्युत उत्पादन केंद्र से विद्युत उपभोग के बिन्दु तक बिजली तारो पर उच्च दाब एवं निम्न दाब के उपकेंद्रो से होते हुये  लंबा मार्ग तय करके हम तक पहुंचती है .  उच्च दाब की बिजली की लाइनें स्टील के टावर अर्थात फ्रेम्ड स्ट्रक्चर पर बनाई गई हैं .  ३३ किलोवोल्ट की लाइने भी शहरी मार्गो में  तथा घने जंगलो में भी रेल पोल या रोल्ड स्टील की ज्वाइस्ट के आई सेक्शन की बनायी जाती हैं .  मितव्ययता की दृष्टि से रीनफोर्सड सीमेंट कांक्रीट , प्रिस्ट्रेस्ड सीमेंट कांक्रीट , स्पन्ड सीमेंट क्रांक्रीट के पाइप के खंबे भी अलग अलग डिजाइन तथा लंबाई के बहतायत में प्रयुक्त किये जा रहे हैं . देश की अलग अलग वितरण कंपनियां अपने अपने कार्य क्षेत्रो में किंचित परिवर्तनो के साथ पी सी सी खंबे ही विद्युतीकरण के लिये कर रही हैं . सामान्यतः ८ मीटर लंबाई, १४० किलो स्ट्रेन्ग्थ  के खंभे ४४० तथा २२०  वोल्ट की वितरण लाइन हेतु एवं ९.१ मीटर लंबाई , २८० किलो स्ट्रेंग्थ के खंबे  ३३ किलोवोल्ट की लाइनो हेतु मध्य प्रदेश में उपयोग किये जा रहे हैं .

क्या है प्री स्ट्रैस्ड सीमेंट कांक्रीट .....
यदि हमें अलमारी में साथ रखी  हुई  कुछ किताबो को एक ही बार में कुछ  दूरी तक ले जाना हो तो हम क्या करते हैं ? हम किताबो के उस समूह को  बांये व दाहिने दोनो ओर से अपने दोनो हाथो से भीतर की ओर दबाते हैं और पूरी किताबें बिना किसी तरह के अन्य सपोर्ट के एक साथ ले जाते हैं . दरअसल इस प्रक्रिया में दोनो हाथो के दबाव से हम किताबो को प्री स्ट्रैस देते हैं . यही प्री स्ट्रैसिंग का मूल सिद्धांत है . जहां रीनफोर्सड सीमेंट कांक्रीट में लोहे की छड़ें डालनी पड़ती हैं , वहीं
प्रिस्ट्रेस्ड सीमेंट कांक्रीट के खंभो  में छड़ो की जगह उच्च तनाव क्षमता के ४ मिली मीटर व्यास के तारो से रीनफोर्समेंट के साथ प्रिस्ट्रेसिंग का भी  काम हो जाता है तथा अधिक लचीलापन प्राप्त किया जाता है . प्री स्ट्रैस्ड सीमेंट कांक्रीट के खंबे निर्माण के समय उच्च तनाव क्षमता के तारो को  तानकर ही कांक्रीटिंग की जाती है जिससे शुरू से ही  कांक्रीट उच्च काम्प्रेशन में रहता है .

निर्माण सामग्री की गुणवत्ता .....
पी सी सी खम्भो के निर्माण हेतु उपयोग की जा रही रेत व गिट्टि अर्थात फाइन व कोर्स एग्रीगेट IS: 383-1970 के अनुरूप होना चाहिये .  विभिन्न तरह की अम्लीय , क्षारीय , लवणीय अशुद्धियो से मुक्त ,समुचित रूप से  ग्रेडेड ,फाइन एवं कोर्स एग्रीगेट ही निर्माण में प्रयुक्त किया जाता है . रेत की ग्रैडिंग हेतु IS:2386-1963 के निर्देशो का पालन किया जाना चाहिये .
सीमेंट IS:8112 या IS: 12269 के अनुरूप होनी चाहिये . ओ पी सी अथवा पी पी सी सीमेंट का प्रयोग किया जाता है . प्रयुक्त सीमेंट का भंडारण इस तरह किया जाना चाहिये कि उसमें कोई बाहरी अशुद्धियां न मिल पावें तथा नमी के कारण उसका कोई सेटलमेंट न हुआ हो .
हाई टेंसाइल  का ४ मि मी व्यास का स्टील तार 17500 किलोग्राम प्रति वर्ग सेंमी टेंसाइल स्ट्रेंग्थ का उपयोग किया जाता है . IS:6003-1970 के अनुरूप Cold drawn indented wire अर्थात ठंडी विधि से खिंचा गया तार जिस पर कांक्रीट की समुचित पकड़ के लिये नियमत दूरी पर कट लगे हो का उपयोग किया जाना चाहिये . लगाये जाने से पहले तार में किसी तरह का जंग आदि नही लगना चाहिये .
कांक्रीट मिक्स बनाने तथा निर्मित खम्भों की क्युरिंग में जो पानी उपयोग में  लाया जावे वह क्लोराइड , सल्फेट , लवणो व आर्गेनिक पदार्थो से मुक्त  होना चाहिये .
चित्र १

प्री स्ट्रैस्ड सीमेंट कांक्रीट खम्भों की निर्माण विधि  .......
प्री स्ट्रैस्ड सीमेंट कांक्रीट के खम्भों की ढ़लाई फैक्ट्री में ,  स्थान की उपलब्धता के अनुसार सामान्यतः  ६ से १० खम्भों की लाइन में  एक साथ की जाती है . इसके लिये लोहे की प्लेट के सांचे स्थापित किये जाते हैं . सांचो के आधार में खम्भे की डिजाइन के अनुसार ढ़ाल या संकीर्णनन बनाया गया होता है , जिससे खम्भा आधार में चौड़ा तथा उपर पतला बनता है . दो दो खम्भो की संयुक्त लाइनें बनाई जाती हैं .
प्रत्येक खम्भे के दोनो छोर पर एक प्लेट लगाई जाती है ,जिसमें रीनफोर्समेंट के लिये नियत स्थान पर छेद बने होते हैं .निर्माण लाइन के एक सिरे पर हाइ टेंसाइल स्ट्रेंग्थ के तार को वेज के द्वारा फिक्स कर दिया जाता है . दूसरे सिरे को कुशल मजदूर के द्वारा प्रत्येक खम्भे के सिरे पर लगी प्लेट में बने निर्धारित छेद में पिरोते हुये निर्माण लाइन के अंतिम सिरे तक पहुंचाया जाता है , जहां एक टेंशनिंग गेंट्री लगी होती है . टेंशनिंग गेंट्री की मोटर को चलाकर तय किया टेंशन तार में दिया जाता है एवं तार के सिरे को प्रत्येक खंबे के सिरो पर वेज के द्वारा फिक्स कर दिया जाता है .ड्राइंग के अनुसार लगाये गये सभी तारो में बराबरी का टेंशन दिया जाना जरूरी होता है .  यह प्रक्रिया सांचे की सफाई के बाद की जाती है , जिससे ढ़लाई साफ सुथरी हो . लम्बाई में हर खम्भे के सांचे के बाद लगभग ५० सेंटीमीटर की जगह खाली छोड़ी जाती है , जिसमें कांक्रीटिंग नही होती , कास्टिंग किये जाने के बाद ३ दिनो की प्रारंभिक स्ट्रेंग्थ मिल जाने पर, हाई स्टील वायर को वेल्डिंग मशीन से या कटर से काट कर खंभो को अलग अलग कर लिया जाता है .
चित्र २ , ३ , ४
पी सी सी खंभो का निर्माण IS 1678-1998 के दिशा निर्देशो के अनुसार किया जाता है .
जरूरी है कि निर्माण हेतु जब कांक्रीट मिक्स तैयार किया जावे तो उसमें न्यूनतम आवश्यक पानी ही मिलाया जावे जिससे सूखने पर खम्भे मे किसी तरह की केपलरी पोरोसिटी न हो व उच्च घनत्व का खम्भा निर्मित हो . कांक्रीट IS:1343-1980 एवं IS:456-2000 के अनुसार  डिजाइन मिक्स होना चाहिये जिसके क्यूब परीक्षण पर 28 दिनो बाद कम से कम 420 किलोग्राम प्रति सेमी  की स्ट्रेंग्थ मिलनी चाहिये अर्थात पी सी सी खम्बो के लिये एम ४२ कांक्रीट का प्रयोग किया जाता है . सीमेंट रेत तथा गिट्टी को पानी के साथ मिक्सर में डिजाइन के अनुरूप वजन से आनुपातिक  रूप से समुचित तरीके से मिलाकर ही प्रयुक्त करना चाहिये .
सांचो में निश्चित समय सीमा में ही तुरंत बनाया गया कांक्रीट डाला जाना चाहिये . तार के उपर कम से कम २० मिली मीटर का निर्धारित कांक्रीट कवर सुनिश्चित किया जाना चाहिये . वाइब्रेटर तथा काम्पेक्शन निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप होना बहुत जरूरी है . देखना चाहिये कि गीले कांक्रीट का तापमान ठंडे मौसम में ४.५ डिग्री सेंटीग्रेड  कम पर तथा गरम मौसम में ३८ डिग्री से अधिक न होवे .
कांक्रीटिंग के तुरंत बाद जब कांक्रीट हलका गीला होता है , खंभे पर निर्माता अपनी फैक्ट्री का नाम एवं निर्माण तिथि , कास्टिंग का बैच नम्बर तथा यदि निर्देश हो तो जिस कंपनी के लिये खंभो का निर्माण किया जा रहा हो उसका नाम भी अंकित कर सकता है .
 चित्र ५
खम्भे की  डिटेंशनिंग अर्थात प्रिस्ट्रेसिंग के दौरान जब तार का टेंशन कांक्रीट में स्थानांतरित होता है ,लगातार  क्यूरिंग  की जाना जरूरी है . स्टीम क्युरिंग की जावे तो इसे कुशल निरीक्षण में ही किया जाना चाहिये . स्टीम क्युरिंग से प्रारंभिक सेटिंग बहुत जल्दी हो जाती है तथा एक ही सांचे से पोल निर्माण की आवृतियां बढ़ जाती हैं .
 क्युरिंग के लिये स्प्रिंकलर या  टेंक क्यूरिंग में से  टेंक क्युरिंग ही बेहतर विकल्प है , समुचित सट्रेंग्थ हेतु २५ दिनो की टेंक क्युरिंग व कम से कम ३ दिनो की सांचे पर निरंतर क्यूरिंग की जानी चाहिये  .  निर्माण स्थल से क्युरिंग टेंक तक खम्भे की हैंडलिंग बहुत सावधानी पूर्वक की जानी चाहिये अन्यथा जोर से पटकने अथवा धक्का लगने से स्थान विशेष पर खम्भा कमजोर हो सकता है . खम्भो की हैंडलिंग के लिये तार के दो आई हुक समुचित दूरी पर कास्टिग के समय ही लगाये जाने चाहिये . इसी तरह अर्थिग हेतु भी गैल्वेनाइजिंग आयरन का ४ मि मी व्यास का तार न्यूनतम कांक्रीट  कवर के साथ प्रत्येक खम्भे में नियत स्थान पर लगाया जाना चाहिये .

बने हुये खंभो का भंडारण
क्यूरिंग टेंक से निकाल कर खंभो को समतल पक्की जमीन पर थप्पी बनाकर एक के उपर एक रखा जाना चाहिये , जिससे कम से कम जगह में सुरक्षित तरीके से भंडारण किया जा सके एवं ट्रक पर लोडिंग करके कार्यस्थल पर भेजने में कठिनाई व किसी तरह की दुर्घटना न हो . चूंकि खंबे एक ओर मोट तथा दूसरी ओर चौड़े होते हैं अतः हर तह अलटी पलटी स्थिति में रखी जाना उचित होता है . खंभो को निर्माण स्थल पर परिवहन के लिये क्रेन का प्रयोग होता है अतः भंडारण स्थल खुली हुई मैदानी जगह होनी चाहिये . भंडारण इस तरह किया जाता है कि खंभो के दोनो छोर पर तारकोल पोता जा सके जिससे एक एंटी कोरोजिव कोट बन सके .
 चित्र ६

प्री स्ट्रैस्ड सीमेंट कांक्रीट पोल का परीक्षण  ......
IS: 1678-1998. परीक्षण हेतु भंडारित खंभो में से परीक्षण हेतु नमूने चुनने के लिये  दिशा दर्शन करता है . प्रत्येक १०० खम्भो में से कम से कम १ खम्भा ट्रान्सवर्स लोड परीक्षण ,एवं डाइमेंशन टेस्ट  हेतु चुना जाता है . ट्रान्सवर्स लोड परीक्षण के प्रत्येक १० खम्भो में से कम से कम ३ खम्भो का डिस्टार्शन टेस्ट किया जाता है . डिस्टार्शन टेस्ट द्वारा देखा जाता है कि खम्भा टूटने से पहले अंततोगत्वा कितना लोड सह पाता है . ट्रान्सवर्स लोड परीक्षण में IS:2905-1989 में प्री स्ट्रैस्ड सीमेंट कांक्रीट पोल की परीक्षण विधि के अनुसार टेस्टिग बेंच पर परीक्षण किया जाता है . टेस्ट खम्भे को खड़ा फिक्स करके या जमीन पर आड़ा लिटाकर किया जा सकता है . टेस्टिंग बेंच पर खंबे के आधार से १.५ मीटर तक खम्भे को एक पक्का सपोर्ट दिया जाता है  , क्योकि जब खम्भे को विद्युत लाइन में उपयोग किया जाता है तब भी उसे जमीन में १.५ मीटर का गड्ढ़ा करके पक्का गाड़ा जाता है . खम्भे के उपरी सिरे से ६० सेंटी मीटर पर एक तार बाँध कर लोड लगा कर परीक्षण किया जाता है , यह माना जाता है कि खम्भे पर जब लाइन खींची जाती है तो उसका औसत लोड ऊपरी सिरे से ६० सेटीमीटर नीचे लगता है . फैक्टर आफ सेफ्टी २.५ लिया जाता है अतः  ८ मीटर लंबाई, १४० किलो स्ट्रेन्ग्थ  के खंभे को ३५० किलो तक के भार पर डिस्टार्शन टेस्ट में टूटना नही चाहिये , तथा खम्भे को इतना लचीला होना चाहिये कि ३५० किलो से  कम भार पर उत्पन्न हेयर क्रेक , लोड हटाने पर पूरी तरह मिट जाने चाहिये . इसी तरह  ९.१ मीटर लंबाई , २८० किलो स्ट्रेंग्थ के खंबे के परीक्षण में डिस्टार्शन ७०० किलो के लोड से पहले नही होना चाहिये तथा उससे कम के लोड पर लोड हटाने पर उत्पन्न हेयर क्रेक पूरी तरह मिट जाने चाहिये . तभी खम्भे को स्वीकार किया जाता है . डाइमेंशन टेस्ट में लम्बाई धन ऋण १५ मि मी तथा चौड़ाई में धन ऋण ३ मि मी तक के परिवर्तन स्वीकार्य होते हैं . परीक्षण हेतु उपयोग में लाये जा रहे इलेक्ट्रनिक या अन्य तरह के गेज मान्य शासकीय विभाग से केलीब्रेटेड होने चाहिये .
प्री स्ट्रैस्ड सीमेंट कांक्रीट पोल का परिवहन , व उन्हें मौके पर लगाने के संबंध में  IS:7321-1974 में आवश्यक  निर्देश दिये गये हैं , जिनका समुचित परिपालन लाइन खड़े करते समय किया जाना चाहिये .
 चित्र ७ , ८ , ९

प्री स्ट्रैस्ड सीमेंट कांक्रीट पोल के निर्माण व उपयोग में मैदानी समस्यायें  तथा सुधार हेतु विचारणीय सुझाव ......

बिजली की लाइने विभिन्न तरह की जमीन , जंगल , और खेतो से होकर गुजरती हैं .काली मिट्टी  गर्मी में सिकुड़ती है तथा बरसात में फूलकर अत्यंत मुलायम हो जाती है तथा उसकी बियरिंग कैपेसिटी नगण्य रह जाती है . पथरीली जमीन में  निर्धारित १.५ मीटर की गहराई का गद्ढ़ा करना संभव नही होता . खेतो में पानी भरने पर खम्भे टेढ़े हो जाते हैं . अतः  पी सी सी खम्भो की फाउण्डेशन पर विचार करना तथा आवश्यक सुधार अपनाना जरूरी है . फाउण्डेशन पिट को कांक्रीट से भरना एक उपाय हो सकता है . खम्भे के फाउण्डेशन के गड्ढ़े में खम्भे के नीचे आधार पर बड़ी चीप का टुकड़ा या प्रीकास्टेड आर सी सी ब्लाक रखना एक अन्य उपाय हो सकता है , जिससे खम्भे तिरछे होने की समस्या से निपटा जा सकता है . . खम्भे के निचले हिस्से में नीचे से ७५ सेंटी मीटर की उंचाई पर यदि एक छेद बनाया जावे तथा खम्भे को खड़ा करते समय उसमें एक मीटर की लोहे की छड़ स्पाइक की तरह डाली जावे तो वह भी खम्भे को सीधा खड़ा रखने में मददगार साबित हो सकती है .

अनेक पोल निर्माण संयंत्रो में पोल परीक्षण हेतु मैंने भ्रमण किया है , एवं पोल निर्माताओ से विस्तृत चर्चायें की हैं . नवोन्मेषी प्रयोगो हेतु उद्यत कुछ निर्माताओ ने मुझसे नदी की रेत के स्थान पर  फाइन क्रशर डस्ट के साथ ताप बिजली घरो से निकली राख के उपयोग के संबंध में अपने सुझाव तथा उसके पोल की स्ट्रेंग्थ पर उसके प्रभाव पर शंकाये व्यक्त की .कुछ निर्माता कोर्स एग्रीग्रेट के स्थान पर क्रशर डस्ट का उपयोग करने के विकल्प प्रस्तुत करते हैं .  कुछ निर्माता कांक्रीट की जल्दी सैटिंग के लिये एडमिक्सचर्स मिलाने के विषय में जानना चाहते हैं . तो कुछ लोग खम्भे के उपरी सिरे पर जहाँ तार लगाने के लिये छेद रखे जाते हैं वहां प्लास्टिक पाइप के टुकड़े कास्टिंग के दौरान  डाल कर स्मूथ छेद बनाने या अतिरिक्त रिंग या तार डालकर खम्भे को टूटने से बचाने के विषय में सुझाव देते हैं . पी सी सी पोल निर्माण उद्योग मात्र व्यापार नही है . पोल की स्ट्रेंग्थ सीधे तौर पर उस पर चढ़ने वाले लाइन मैन की जान की सुरक्षा से जुड़ी होती है तथा किसी एक खम्भे के टूटने से भी जो विद्युत प्रवाह अवरुद्ध होता है उससे प्रगट अप्रगट रूप से उस विद्युत लाइन से जुड़े उपभोक्ताओ पर गहरा प्रभाव होता है.यह महत्व  २.५ का जो फैक्टर आफ सेफ्टी रखा गया है उससे कही बढ़कर है , अतः पर्याप्त परीक्षण के बाद ही कोई परिवर्तन स्वीकार किया जाना चाहिये किन्तु राष्ट्र के व्यापक हित में इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलेपमेंट में मितव्ययता एवं नवाचार को बढ़ावा देने के लिये इस दिशा में अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाना भी जरूरी है .  

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