28 जुलाई, 2011

community-based renewable energy ..CITATION for Tri Mumpuni , Indonatia

community-based renewable energy  ..CITATION for Tri Mumpuni
Ramon Magsaysay Award Presentation Ceremonies
31 August 2011, Manila, Philippines

In electing Tri Mumpuni to receive the 2011 Ramon Magsaysay Award, the board of trustees recognizes her determined and collaborative efforts to promote micro hydropower technology, catalyze needed policy changes, and ensure full community participation, in bringing electricity and the fruits of development to the rural areas of Indonesia.


Mumpuni had to struggle with restrictive state regulations, complex financing requirements, and the draining demands of social mobilization work. To meet the twin challenges of a social enterprise.remaining viable as a business without compromising its social mission.she had to focus all her energies on working at the level of the poorest communities, as well as with the highest government authorities.From its base in Subang, West Java, IBEKA (Indonaition name of her orgnisation "People-Centered Business and Economic Institute")has built 60 micro hydropower plants, with capacities ranging from 5 kilowatts to 250 kilowatts, providing electricity to half a million people in rural Indonesia. Equally important, it has done this through a community-based development approach that goes beyond the technology to the socioeconomic empowerment of communities. Putting a premium on community participation and ownership, IBEKA organizes electric cooperatives, trains villagers in technical management and resource conservation, and provides support in fund-facilitation Mumpuni works at the national level in promoting the role of hydropower in development, and in designing and implementing new models of government-business-community joint ventures in micro hydropower facilities. Boldly enterprising, she has effectively lobbied for changes in state policy that now allow independent micro hydropower plants to sell electricity to the government.s national grid.Skill, creativity, and determination, however, have turned IBEKA into an outstanding Indonesian example of social entrepreneurship, and cast Mumpuni as a much-admired and influential leader in the field of community-based renewable energy.  and income-generating activities.







22 जुलाई, 2011

परमाणु विभीषिका का विकिरण देशो की सीमायें नही पहचानता

जापान में परमाणु रिएक्टर दुर्घटना के परिप्रेक्ष्य में , भारत में परमाणु शक्ति जनित बिजली.

विवेक रंजन श्रीवास्तव
जन संपर्क अधिकारी , म.प्र. पूर्वी क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी , जबलपुर
ओ बी ११ , रामपुर , जबलपुर म प्र. ४८२००८
मो ९४२५८०६२५२


        फुकुशिमा जापान की परमाणु दुर्घटना पूरी दुनियां के अस्तित्व के लिए चेतावनी बनकर सामने आई है . अब तक इतनी भीषण परमाणु दुर्घटना पहले कभी नही घटी थी .
 तीन दशक पहले अमेरिका के थ्री माइल आइलैंड में परमाणु दुर्घटना हुई थी। इस परमाणु दुर्घटना ने वहां के असैन्य परमाणु कार्यक्रम पर ग्रहण लगा दिया। इसका असर यह हुआ कि 1978 के बाद अमेरिका में कोई परमाणु रिएक्टर नहीं लगा। दो दशक पहले 1986 में रूस के चेर्नोबिल की परमाणु दुर्घटना ने पूरी दुनिया को हिला दिया। ऐसा अनुमान है कि इस दुर्घटना की वजह से तकरीबन नब्बे हजार लोग काल के गाल में समा गए। इस परमाणु केंद्र को स्थापित करने में जितनी लागत लगी थी उससे तीन गुना अधिक नुकसान हुआ। भारत के परमाणु बिजलीघरों में भी दुर्घटनाएं हुई हैं लेकिन संयोग से अभी तक ये बेहद घातक नहीं साबित हुईं . आज हम सोचने पर विवश हैं कि  रिएक्टर के तौर पर हम कहीं अपनी ही मौत का सामान तो नहीं बना रहे। फुकुशिमा के परमाणु बिजलीघर में हुए विस्फोट के बाद पूरी दुनिया में आणविक ऊर्जा की जरूरत को लेकर बहस छिड़ गई है . जर्मनी ने तो वहां परमाणु बिजली का उत्पादन क्रमशः बंद करने का फैसला तक ले लिया है .चीन ने भी नए रिएक्टरों पर फिलहाल रोक लगा दी है .दरअसल परमाणु दुर्घटनाओ के भयावह प्रभाव तुरंत नही दिखते , बिजलीघर के आसपास रहने वाले और यहां काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों पर विकिरण का असर आने वाले दिनों में दिखेगा, विकृत पीढ़ी का जन्म बरसो तक एसी दुर्गटना की याद दिलाता है .  हवा में जो रेडियोधर्मिता फैली है, वह अपना असर कब, कहां और किस तरह दिखाएगी इसके बारे में साफ तौर पर कोई बता नहीं सकता .अभी के परमाणु ज्ञान के अनुसार हमारी स्थिति अभिमन्यु जैसी है , जो चक्रव्यू में घुस तो सकता है , पर उससे निकलने का रास्ता अब तक हमारे पास नही है .
         भारत में भी परमाणु मामले में विशेषज्ञ दो खेमे में बंटे हुए हैं , एक खेमा वह है जो इस बात की वकालत करते हुए नहीं थकता  कि भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का अहम जरिया आणविक ऊर्जा है , क्योकि हमारे यहां कुल बिजली उत्पादन में परमाणु बिजली की भागीदारी अपेक्षाकृत बहुत कम है , वहीं दूसरा पक्ष दूसरो की गलतियो से सीख लेने की बात करता है और आणविक ऊर्जा को विश्व के लिए बहुत बड़ा खतरा बता रहा है. इस सारी बहस के बीच हमारे २५वें परमाणु बिजली घर का कार्य राजस्थान में प्रारंभ किया जा चुका है .प्रधानमंत्री ने भी संसद में कहा कि परमाणु बिजलीघरों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी,केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश  कह चुके हैं कि भारत परमाणु ऊर्जा उत्पादन के मामले में बहुत आगे बढ़ गया है और अब पीछे नहीं हटा जा सकता . दरअसल, आज सरकारी स्तर पर परमाणु ऊर्जा को लेकर जिस भाषा में बात की जा रही है, वह भाषा अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार से जुड़ी हुई है। सरकार बार-बार यह दावा कर रही है कि परमाणु करार सही ढंग से लागू हो जाए तो हम इतनी बिजली पैदा कर पाएंगे कि घर-घर तक उजियारा फैल जाएगा और गांवों में सदियों से चला आ रहा अंधियारा पलक झपकते दूर हो जाएगा . वर्ल्ड बैंक ,एशियन डेवलेपमेंट बैंक ,  जापान ,आदि विदेशी सहायता से पावर इवेक्युएशन के लिये देश भर में हाईटेंशन ग्रिड और वितरण लाइनो तथा सबस्टेशनो का जाल बिछा दिया गया है . विभिन्न प्रदेशो में केंद्र सरकार की आर ए पी डी आर पी आदि पावर रिफार्म योजनाओ के विभिन्न चरण तेजी से लागू किये जा रहे हैं .
        अध्ययन प्रमाणित कर चुके हैं कि परमाणु ऊर्जा की लागत ताप विद्युत ऊर्जा से दुगनी होती  है . महाराष्ट्र में कुछ साल पहले बिजली जरूरतों को पूरा करने के नाम पर एनरान नेप्था बिजली परियोजना लगाई गई थी,  उस समय यह दावा किया गया था कि इससे महाराष्ट्र की बिजली की समस्या से काफी हद तक पार पा लिया जाएगा,  पर नतीजा इसके उलटा ही निकला. एनरान में उत्पादित बिजली इतनी महंगी साबित हुयी कि इसे बंद ही करना पड़ा . इस प्रकरण में सरकार को तकरीबन दस हजार करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा. अब एक बार फिर महाराष्ट्र के जैतापुर में 9900 मेगावाट क्षमता वाला परमाणु बिजलीघर लगाने की कोशिश हो रही है, स्थानीय लोग इसका लगातार विरोध कर रहे हैं लेकिन सरकार इस परियोजना को बंद करने के सवाल पर टस से मस नहीं हो रही.
         अमेरिका ने पिछले तीन दशकों में कोई भी परमाणु बिजली घर  नहीं लगाया है. उल्लेखनीय है कि वहां 104 परमाणु बिजली घर हैं. इसमें से सभी तीस साल से अधिक पुराने हैं. परमाणु ऊर्जा के समर्थक बड़े जोर-शोर से फ्रांस का उदाहरण देते हैं. फ्रांस को 75 फीसदी बिजली परमाणु बिजली घरों से मिलती है. यह बिल्कुल सही है, लेकिन अगर परमाणु रिएक्टरों से बिजली पैदा करना वाकई लाभप्रद है तो फ्रांस अपने यहां और परमाणु बिजली घर क्यों नहीं स्थापित कर रहा है .उल्लेखनीय  है कि आने वाले दिनों में वहां सिर्फ एक परमाणु रिएक्टर प्रस्तावित है, ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि आणविक बिजली बेहद महंगी साबित हो रही है. एक  उदाहरण आस्ट्रेलिया का भी है, आस्ट्रेलिया के पास दुनिया में सबसे ज्यादा यूरेनियम है, पर वहां एक भी परमाणु बिजली घर नहीं है.इसका सीधा संबंध लागत और सुरक्षा से है. जब कम लागत पर वही चीज उत्पादित की जा सकती है तो कोई भी उसका उत्पादन ज्यादा लागत पर क्यों करेगा? वर्ल्ड वॉच इंस्टीट्यूट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर पूरी दुनिया में परमाणु बिजलीघरों के जरिए 3,72,000 मेगावाट बिजली बनाई जा रही है और इसकी विकास दर आधा प्रतिशत मात्र है. आधा फीसदी की यह विकास दर भी स्थाई नहीं है। 1964 से अब तक दुनिया में 124 रिएक्टर बंद कर दिए गए जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 36800 मेगावाट थी. 1990 में विश्व के कुल ऊर्जा उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी सोलह प्रतिशत थी. 2007 में यह घटकर पंद्रह प्रतिशत हो गई. दुनिया के ज्यादातर देश परमाणु ऊर्जा के उत्पादन से किनारा करते जा रहे हैं
जब तकनीकी तौर पर बेहद सक्षम जापान के लिए परमाणु बिजलीघर में हुए विस्फोट पर काबू पाना बेहद मुश्किल साबित हुआ तो ऐसी स्थिति में भारत का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.
        अनुमान है कि 2020 में भारत में आठ लाख मेगावाट बिजली पैदा होगी, अगर आणविक ऊर्जा की योजना अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेगी तो 20,000 मेगावाट पैदा कर पाएगी, जिसकी लागत  11 लाख करोड़ रुपए होगी . इसके लिए आठ लाख हेक्टेयर जमीन की जरूरत होगी. रिएक्टर के पांच किलोमीटर की परिधि में आबादी नहीं रहेगी। इन क्षेत्रों से बेदखल कर दिए जाने वाले लोगों का पुनर्वास कैसे होगा ? लागत के अनुमान के अनुसार परमाणु बिजली की उत्पादन लागत  21 रुपए प्रति यूनिट होगी .देश में परमाणु बिजली के क्षेत्र में कारोबार की काफी संभावना है, सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश के मौके तलाश रही हैं . ऐसा नहीं है कि परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में रिटर्न की भारी संभावना है .लेकिन निजी  कंपनियां इस क्षेत्र में जो दिलचस्पी दिखा रही है उसका कारण यह  है कि ऊर्जा क्षेत्र में नीति-निर्माण के स्तर पर अहम फैसले लिये जा रहे हैं. सरकार चाहती है कि परमाणु बिजली का उत्पादन बढ़ाया जावे . सरकार इंडियन ऑयल कॉरपोरशन, नाल्को और एनटीपीसी जैसी कंपनियो को  परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं का समर्थन करने के लिये प्रेरित कर रही है .  सरकार चाहती है कि 2020 तक देश में 20,000 मेगावाट  परमाणु बिजली पैदा होने की क्षमता स्थापित हो जाए . परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के मामले में एक गंभीर समस्या इसके कचरे का निस्तारण भी है, उपयोग में लाए गए परमाणु ईंधन का निस्तारण करना बेहद जटिल प्रक्रिया है. कुछ समय पहले ब्रिटेन में एक परमाणु ईंधन स्टोर लीक हो गया जिससे हजार किलोमीटर के दायरे का पानी प्रदूषित हो गया. भारत को आणविक कचरा सुरक्षित फेंकने के लिए हर साल तीन अरब डालर खर्च करने होंगे. यह भी तय नहीं है कि भारत अपना परमाणु कचरा कहां फेंकेगा.  जापान की परमाणु त्रासदी हमारे लिए एक सबक है , हमे परमाणु सयंत्र के डिजाईन फुल प्रूफ बनाने होंगे .
        वर्तमान में दुनिया में बिजली का सबसे अहम स्रोत कोयला और पेट्रोलियम है लेकिन दोनों स्रोत करोड़ों साल पहले धरती के नीचे दब गए जीव और वनस्पति के सड़ने गलने से बनते हैं और इनको बनने में करोड़ों साल लग जाते हैं। इसलिए अगर ये एक बार खत्म हो गए तो दुबारा बनने में अरबों साल लग जाएंगे। दुनिया की कुल बिजली का करीब 50 फीसदी उत्पादन कोयले से होता है और अगर हम मौजूदा दर से खपत करते हैं तो अगले डेढ़ सौ सालों में कोयले के भंडार खत्म हो जाएंगे. पेट्रोलियम के भंडार भी कोयले की तरह ही सीमित हैं. कार्बन के भण्डार वाले कोयले और पेट्रोलियम के इस्तेमाल से हम धरती के निरंतर बढ़ते तापमान पर  कैसे काबू रख पाएंगे ?  बढ़ता कार्बन उत्सर्जन भी इंसानी वजूद के लिए खतरा है .
तो अब विकल्प क्या है ? क्या अब बिजली के लिये पूर्णतः समुद्र की लहरो , सूर्य और वायुदेव की शरण में जाने का वक्त आ गया है ?
        विकल्प ज्यादा नही है , बिना बिजली के जीवन की कल्पना दुष्कर है . एक संतुलित राह बनानी जरुरी है , कम से कम बिजली का उपयोग , वैकल्पिक उर्जा स्त्रोतो का हर संभव दोहन , सुरक्षित परमाणु बिजली का उत्पादन और इस सबके साथ ऊर्जा के लिये नये अनुसंधान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिये . क्या समुद्रतल पर अथाह जलराशि के भीतर परमाणु बिजलीघर बनाये जावें ? या अंतरिक्ष में परमाणु बिजली उत्पादन किया जावे ? क्या बादल से बरसते पानी को आकाश में ही एकत्रित करके  नियंत्रित करके जमीन पर नही उतारा जा सकता ? बिजली भी बन जायेगी और बाढ़ की विभीषिका भि नही होगी ! क्या ये परिकल्पनाये केवल मेरी विज्ञान कथाओ तक सीमित रहेंगी ? यदि इन्हें साकार करना है तो समूचे विश्व के वैज्ञानिको को एक होकर नये अनुसंधान करने पड़ेंगे , क्योकि परमाणु विभीषिका का विकिरण देशो की सीमायें नही पहचानता . उर्जा क्षेत्र में अनुसंधान दुनिया के अस्तित्व के लिये जरुरी हो चला है . 

sabhar ..BBC HINDI अंधकार से प्रकाश की ओर...

अंधकार से प्रकाश की ओर...

सिटीज़न रिपोर्टर रत्ननेश यादव
बिजली बनाने के काम में जुटे सिटीज़न रिपोर्टर रत्ननेश यादव.
शहरों की चकाचौंध रातों के बीच गांव की घुप्प अंधेरी रातों में ज़िंदगी आज भी जगमगाती नहीं टिमटिमाती है.
लेकिन इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि भारत के हज़ारों गांव बिजली की पहुंच से दूर हैं और लोगों के पास अपनी ज़रूरतों के लिए भी ये सुविधा उपलब्ध नहीं है.
गांव की इसी ज़रूरत को पूरा करने के लिए बिहार के कुछ नौजवान इक्कठा हुए और एक ऐसा तरीका इजाद किया जिसमें मुनाफ़ा भी है और समाज सेवा भी.
सिटीज़न रिपोर्ट की इस कड़ी में पेश है इन नौजवानों की अनोखी कोशिश से जुड़ी रत्नेश यादव की रिपोर्ट.
'' मेरा नाम रत्नेश यादव है और अपनी इस रिपोर्ट के ज़रिये मैं आपको बताना चाहता हूँ की मैंने और मेरे कुछ साथियों ने मिलकर 'बायोमास' के ज़रिए किस तरह बिहार के कई सौ गाँव को रोशन किया है.
मेरा जन्म बिहार में हुआ लेकिन पढ़ाई-लिखाई के लिए बचपन में ही मैं नैनिताल चला गया. कई साल बाद परिवार की ज़िम्मेदारियां मुझे अपने गांव खींच लाईं, लेकिन गांव लौटकर पहली बार मुझे भारत की दो तस्वीरों का फर्क महसूस हुआ.
साल 2003 में जब मैं बिहार आया तो यहां आकर मुझे एहसास हुआ कि शहरों में हम जिस बिजली को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा मान लेते हैं वो गांव के लिए आज भी कितना बड़ा सपना है.

अंधकार में डूबे गांव

पटना से बाहर निकलते ही मानो बिहार अंधेरे में डूब जाता था. रात को तो ज़िंदगी पूरी तरह ठहर जाती थी. ऐसे में मैंने तय किया कि मैं इस इलाके के लिए ऊर्जा के क्षेत्र में काम करूंगा.
पहले गांवभर में लोग आठ बजते-बजते सो जाते थे. रात को सांप-बिच्छु का डर रहता था और चोरियां भी हो जाती थीं. बिजली आने के बाद ऐसा नहीं होता. अब हमें तेल खत्म होने पर पढ़ाई रोकने का गर भी नहीं है. हम जब चाहे पढ़ सकते हैं.
हरेश, छात्र एवं स्थानीय निवासी
अंधकार में डूबे इन गांव और कस्बों तक रोशनी पहुंचाने के लिए मैंने अपने कुछ साथियों से भी बातचीत की और मेरे साथ जुड़े स्कूल के दिनों के मेरे साथी ग्यानेश पांडेय.
हम लोगों को एक ऐसी तकनीक की तलाश थी जो सस्ती हो, किफ़ायती हो और गांव की व्यवस्था से मेल खाए.
हमने बिजली बनाने और उसके लिए 'बायोमास गैसिफ़िकेशन' की तकनीक का इस्तेमाल करने का फ़ैसला किया.
ये एक ऐसी तकनीक है जिसमें ईंधन के तौर पर बायोमास का इस्तेमाल किया जाता है और उससे पैदा हुई गैस को जलाकर बिजली बनाई जा सकती है.
ये इलाका धान की खेती के लिए मशहूर है और खेती के बाद कचरे के रुप में धान की भूसी इस इलाके में बहुतायत में मौजूद थी.
ऐसे में हमने ईंधन के तौर पर धान की भूसी का ही इस्तेमाल करने का फ़ैसला किया. हमने अपनी इस परियोजना को ‘हस्क पावर सिस्टम्स’ का नाम दिया.
लालटेन और ढिबरी की रोशनी में जी रहे गांववालों को एकाएक इस नए तरीके पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन आधी से भी कम कीमत पर मिल रही बिजली की सुविधा को वो ज़्यादा दिन तक नकार नहीं सके.
आमतौर पर गांव में हर घर दो से तीन घंटे लालटेन या ढिबरी जलाने के लिए कैरोसीन तेल पर 120 से 150 रुपए खर्च करता है.
ऐसे में ‘हस्क पावर सिस्टम्स’ के ज़रिए हमने गांववालों को 100 रुपए महीना पर छह घंटे रोज़ के लिए दो सीएफएल जलाने की सुविधा दी
आखिरकार साल 2007 को ‘हस्क पावर सिस्टम्स’ की पहली कोशिश क़ामयाब हुई. हमने बिहार के ‘तमकुआ’ गांव में धान की भूसी से बिजली पैदा करने का पहला प्लांट लगया और गांव तक रौशनी पहुंचाई.
संयोग से ‘तमकुआ’ का मतलब होता है 'अंधकार भरा कोहरा' और इस तरह 15 अगस्त 2007 को भारत की आज़ादी की 60वीं वर्षगांठ पर हमने ‘तमकुआ’ को उसके अंधेरे से आज़ादी दिलाई.

कचरे से बिजली.

भारत में सिर्फ धान के भूसे से 27 गीगा-वॉट बिजली उत्पन्न करने की क्षमता है. उड़ीसा, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों में बड़े स्तर पर धान की खेती होती है और कचरे के रुप में धान की भूसी निकलती है. इन सभी राज्यों मे इसका इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है.
कुलमिलाकर अपनी इस कोशिश के ज़रिए हमने गांव में बहुतायत में मौजूद एक बेकार सी चीज़ का नायाब इस्तेमाल ढूंढ निकाला.
यही नहीं ईंधन के रुप में इस्तेमाल के बाद बचे भूसे की राख से महिलाएं अगरबत्तियां बनाती हैं और हर दिन का 60 रुपए तक कमा लेती हैं.
साथ ही 'हस्क पावर सिस्टम' के ज़रिए स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिल रहा है क्योंकि प्लांट का सारा काम स्थानीय लोग और गांववाले ही करते हैं.
बिजली ने कई मायने में तमकुआ के लोगों की ज़िंदगी बदल दी है.
छठी कक्षा में पढ़ने वाला हरेश कहता है, ''पहले गांवभर में लोग आठ बजते-बजते सो जाते थे. रात को सांप-बिच्छु का डर रहता था और चोरियां भी हो जाती थीं. बिजली आने के बाद ऐसा नहीं होता. अब हमें तेल खत्म होने पर पढ़ाई रोकने का डर भी नहीं है. हम जब चाहे पढ़ सकते हैं.''
हमारी इस कोशिश को व्यापार और समाजसेवा की एक नायाब कोशिश के रुप में पहचान देने के लिए साल 2011 में हमें 'एशडेन पुरस्कार' से भी नवाज़ा गया.
मेरा और मेरे साथियों का मानना है कि ये बदलाव सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहना चाहिए.
भारत में सिर्फ धान के भूसे से 27 गीगा-वॉट बिजली उत्पन्न करने की क्षमता है. उड़ीसा, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों में बड़े स्तर पर धान की खेती होती है और कचरे के रुप में धान की भूसी निकलती है. इन सभी राज्यों मे इसका इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है.
हमारा लक्ष्य है 'तमसो मा ज्योतिर्गमय...' यानि अंधकार से प्रकाश की ओर और हम अपनी इस कोशिश को अंधेरे में डूबे भारत के हर गांव तक पहुंचना चाहते हैं.''

बिजली की कटौती..जापान ने बनाई एसी के साथ जैकेट

 साभार रेडियो दायचेवेली
गर्मी से मारे जापान ने बनाई एसी के साथ जैकेट

मार्च में फुकुशिमा दाइची परमाणु संयंत्र में खराबी आने के बाद जापान को बिजली की कमी से जूझना पड़ रहा है. गर्मी से निजात पाने के लिए जापान में एयरकंडीशंड जैकेट बिक रही हैं.


गर्मी के मौसम में बिजली की कटौती ने जापान के लोगों को परेशान किया हुआ है. लेकिन जापान के लोगों को नई नई तकनीक के लिए जाना जाता है. इस समस्या का भी हल वहां के लोगों ने निकाल लिया है. कुचोफुकू नाम की कंपनी ने एयरकंडीशंड जैकेट तैयार किए हैं. मजेदार बात यह है कि जापानी भाषा में कुचोफुकू का मतलब होता है हवादार कपड़े.

जापान में ये जैकेट हाथों हाथ बिक रहे हैं. मांग इतनी ज्यादा है कि कंपनी के लिए उसे पूरा करना भी मुश्किल पड़ रहा है. इस जैकेट में दो पंखे लगे हुए हैं. दोनों को अलग अलग स्पीड पर चलाया जा सकता है. ये पंखे बैटरी से चलते हैं. हवा इतनी तेज कि जैकेट के कॉलर और कफ तक आराम से पहुंच पाती है. इस जैकेट से आप पसीना तो सुखा ही सकते हैं, साथ ही तरोताजा भी महसूस करते हैं. एक जैकेट का दाम 11 हजार येन यानी करीब छह हजार रुपये है.

मजदूरी करने वाले 33 वर्षीय रेयो इगारशी ने भी यह जैकेट खरीदी है. वह बताते हैं, "मैं बहुत गर्म जगह पर काम करता हूं और मुझे पूरी आस्तीन के कपड़े पहनने पड़ते हैं. इसलिए मैं यहां यह जैकेट खरीदने आया हूं ताकि गर्मी से बच सकूं... आम तौर पर गर्मी लगने पर लोग कम कपड़े पहनते हैं, लेकिन कुचोफोकू तो ऐसा है कि ज्यादा गर्मी में और भी ज्यादा कपड़े."

एयरकंडीशंड तकिए और कालीन

कुचोफुकू जैकेट्स को जापान की करीब एक हजार कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए इस्तेमाल कर रही हैं. कंपनियां की इमारतों में लगे एयरकंडीशन तो अब काम नहीं कर रहे, लेकिन लोगों की ये एयरकंडीशंड जैकेट्स उन्हें गर्मी से दूर रखने का काम बखूबी करती हैं. जैकेट्स के अलावा यह कंपनी एयरकंडीशंड तकिए और कालीन भी बनाती हैं. इनमें पंखे तो नहीं लगे होते, लेकिन एक खास तरह की तकनीक हवा को फैलाने का काम करती है. यह कंपनी 2004 से इस तरह की चीजें बना रही है. अब तक इसे फैक्ट्रियों और कंस्ट्रक्शन साइटों से ऑर्डर मिला करते थे, लेकिन अब दफ्तर जाने वाले लोग और घर पर रहने वाली महिलाओं में भी इनकी मांग बढ़ गई है.

दो दशक पहले

कुचोफुकू कंपनी के अध्यक्ष हिरोशी इचिगाया को यह अनोखा आइडिया आज से दो दशक पहले 1990 में आया. तब वे सोनी कंपनी में एयरकंडीशन बनाने का काम किया करते थे. इचिगाया बताते हैं, "मैंने सोचा कि हमें पूरे कमरे को ठंडा करने की क्या जरूरत है, बस उसमें बैठे लोगों को ही अगर गर्मी से निजाद मिल जाए तो उतना ही काफी है." हाल ही में इन्हें सरकार की ओर से पांच लाख जैकेट्स का ऑर्डर आया, जो उन्हें ठुकराना पड़ा क्योंकि उनके पास इतनी सारी जैकेट्स बनाने की क्षमता नहीं है. इस साल वे 40 हजार जैकेट्स और अन्य चीजें बेच चुके हैं. इचिगाया उम्मीद करते हैं कि साल के अंत तक वो इस संख्या को 80 हजार तक पहुंचा पाएंगे.

फुकुशीमा संयंत्र के खराब होने के बाद से सरकार ने आदेश दिए हैं कि टोक्यो और तोहोकू में कंपनियां बिजली की कटौती से बचने के लिए खपत में 15 प्रतिशत की कमी लाएं. इसलिए वहां गर्मी के मौसम में भी एसी बंद पड़े हैं.

रिपोर्ट: एएफपी/ ईशा भाटिया

11 जुलाई, 2011

सुधार के लिए तकनीक और निवेश दोनों पर जोर

पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के सीएमडी श्री मनीष रस्तोगी का कहना
अधिकारी भी भुगतेंगे चोरी का खामियाजा
 सुधार के लिए तकनीक और निवेश दोनों पर जोर

जबलपुर। बिजली चोरी का खामियाजा अब अकेले आम उपभोक्ता ही नहीं बल्कि अधिकारी भी भुगतेंगे। ये दो टूक बात पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के नवपदस्थ सीएमडी मनीष रस्तोगी ने संवाददाताओं से पहली दफा मुखातिब होने के दौरान कही।

श्री रस्तोगी ने कहा कि अभी वितरण हानि के आधार पर फीडरवार बिजली कटौती हो रही है। इसके कारण ईमानदार बिजली उपभोक्ताओं को भी बिजली कटौती की सजा भुगतनी पड़ती है। अब हम फीडरवार हानि के साथ उपभोक्ता के घर तक नई तकनीक से ये जानने का प्रयास करेंगे कि कहां कितना लॉस है? इसमें थोड़ा वक्त लग सकता है लेकिन इस दौरान हम अपने अधिकारियों को भी इस बात के लिए जवाबदेह बना रहे हैं कि वो बिजली चोरी को पूरी तरह से रोंके। यदि कहीं लॉस ज्यादा है तो उसके लिए संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदार माना जाएगा और उन पर वित्तीय जुर्माना निर्धारित किया जाएगा। श्री रस्तोगी के अनुसार, पहले भी वेतन रोकने जैसी पहल हुई है लेकिन अब हम इसके लिए विधिवत एक प्लान बनाने जा रहे हैं। उन्होंने माना कि बिजली चोरी बिना सख्ती के नहीं रुक सकती। बड़े बकायादारों के खिलाफ भी वसूली अभियान तेजी से और सख्ती से चलाया जाएगा। इसमें ये नहीं देखा जाएगा कि कौन रसूखदार है और कौन नहीं? एक सवाल के जवाब में उनका कहना था कि बिजली वितरण क्षेत्र के उन्नयन के लिए व्यापक स्तर पर आर्थिक निवेश और नई तकनीक को शामिल करने की जरूरत है। इस दिशा में प्रयास चल रहे हैं। जिसके परिणाम अच्छे आएंगे। उन्होंने फीडर विभक्तिकरण प्रोजेक्ट की जानकारी देते हुए कहा कि इसके लिए टेंडर जारी हो चुके हैं और फेज टू के इस काम को हम तेजी से पूरा कराएंगे। इस प्रोजेक्ट से प्रदेश सरकार किसानों और ग्रामीणों को भरपूर बिजली देना चाहती है। हम उसे निराश होने का मौका नहीं देंगे। कर्मियों की कमी संबंधी सवाल पर उन्होंने कहा कि हम उनकी भूमिका को चिन्हित कर उनकी जवाबदारियां नए सिरे से तय कर रहे हैं। इससे मानव संसाधन का बेहतर उपयोग हो सकेगा। इसके साथ ही नई भर्तियों के लिए जो निर्णय हो चुके हैं उनको पूरी प्राथमिकता से किया जाएगा। जहां तक पूर्व क्षेत्र से बड़ी संख्या में अधिकारियों कर्मचारियों का दूसरी कंपनियों में जाने आवेदन करने का सवाल है, इस प्रक्रिया को पूरा हो जाने के बाद ही हम देखेंगे कि कंपनी के लिए क्या कदम उठाए जाना जरूरी है। एक सवाल पर उन्होंने कहा कि केवल नाभिकीय बिजली उत्पादन बढ़ाने के बजाए हमें अपरंपरागत बिजली उत्पादन की दिशा में भी तेजी से सोचना होगा। खासकर सोलर इनर्जी के क्षेत्र में। पत्रवार्ता के दौरान कंपनी के अतिरिक्त सचिव एससी गुप्ता, जनसंपर्क अधिकारी राकेश पाठक, विवेक रंजन श्रीवास्तव व अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

06 जुलाई, 2011

पूर्वी क्षेत्र वितरण कंपनी , जबलपुर के सी एम डी का पदभार संभाला श्री मनीष रस्तोगी ने...

श्री मनीष रस्तोगी  ने पूर्वी क्षेत्र  वितरण कंपनी , जबलपुर के सी एम डी का पदभार संभाल लिया है . स्वागत . उल्लेखनीय है कि वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी श्री रस्तोगी , कलेक्टर भोपाल , सतना , नरसिंगपुर जैसे महत्वपूर्ण तथा चुनौती पूर्ण जिलो में जनअपेक्षाओ पर खरे उतरते हुये अपनी सेवाये दे चुके हैं . वे इंजीनियरिंग में बी टेक स्नातक हैं , इस दृष्टि से ,एक आधारभूत रूप से इंजीनियर ,विद्युत आपूर्ति जैसे अति संवेदनशील , तेजी से बदलती व्यवस्थाओ के बीच व मूलभूत इंफ्रास्ट्रक्चर इंजीनियरिंग विभाग के प्रशासक की भूमिका में उनका नेतृत्व सृजनात्मक परिणाम दे सकेगा यही अपेक्षायें हैं . स्वागत है सर ! हम  आपके अनुगामी  हैं.

19 जून, 2011

.लोकतंत्र की सबसे बडी कमजोरी विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र

केवल पक्ष , विपक्ष का होना ...लोकतंत्र की सबसे बडी कमजोरी

विवेक रंजन  श्रीवास्तव ‘विनम्र

ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर (मप्र)  मो. 9425806252

                कोई भी सभ्य समाज नियमों से ही चल सकता है। जनहितकारी नियमों को बनाने और उनके परिपालन को सुनिश्चित करने के लिए शासन की आवश्यकता होती है। राजतंत्र, तानाशाही, धार्मिक सत्ता या लोकतंत्र, नामांकित जनप्रतिनिधियों जैसी विभिन्न शासन प्रणालियों में लोकतंत्र ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि लोकतंत्र में आम आदमी की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित होती है एवं उसे भी जन नेतृत्व करने का अधिकार होता है। भारत में हमने लिखित संविधान अपनाया है। शासन तंत्र को विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के उपखंडो में विभाजित कर एक सुदृढ लोकतंत्र की परिकल्पना की है। विधायिका लोकहितकारी नियमों को कानून का रूप देती है। कार्यपालिका उसका अनुपालन कराती है एवं कानून उल्लंघन करने  पर न्यायपालिका द्वारा दंड का प्रावधान है। विधायिका के जनप्रतिनिधियों का चुनाव आम नागरिको के सीधे मतदान के द्वारा किया जाता है किंतु हमारे देश में आजादी के बाद के अनुभव के आधार पर , मेरे मत में इस चुनाव के लिए पार्टीवाद तथा चुनावी जीत के बाद संसद एवं विधानसभाओं में पक्ष विपक्ष की राजनीति ही लोकतंत्र की सबसे बडी कमजोरी के रूप में सामने आई है।
                सत्तापक्ष कितना भी अच्छा बजट बनाये या कोई अच्छे से अच्छा जनहितकारी कानून बनाये विपक्ष उसका विरोध करता ही है। उसे जनविरोधी निरूपित करने के लिए तर्क कुतर्क करने में जरा भी पीछे नहीं रहता। ऐसा केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि वह विपक्ष में है। हमने देखा है कि वही विपक्षी दल जो विरोधी पार्टी के रूप में जिन बातो का सार्वजनिक विरोध करते नहीं थकता था , जब सत्ता में आया तो उन्होनें भी वही सब किया और इस बार पूर्व के सत्ताधारी दलो ने उन्हीं तथ्यों का पुरजोर विरोध किया जिनके कभी वे खुले समर्थन में थे। इसके लिये लच्छेदार शब्दो का मायाजाल फैलाया जाता है। ऐसा बार-बार लगातार हो रहा है। अर्थात हमारे लोकतंत्र में यह धारणा बन चुकी है कि विपक्षी दल को सत्ता पक्ष का विरोध करना ही चाहिये . शायद इसके लिये स्कूलो से ही ,  वादविवाद प्रतियोगिता की जो अवधारणा बच्चो के मन में अधिरोपित की जाती है वही जिम्मेदार हो .  वास्तविकता यह होती है कि कोई भी सत्तारूढ दल सब कुछ सही या सब कुछ गलत नहीं करता । सच्चा  लोकतंत्र तो यह होता कि मुद्दे के आधार पर पार्टी निरपेक्ष वोटिंग होती, विषय की गुणवत्ता के आधार पर बहुमत से निर्णय लिया जाता , पर ऐसा हो नही रहा है ।
                अन्ना हजारे या बाबा रामदेव किसी पार्टी या किसी लोकतांत्रिक संस्था के निर्वाचित जनप्रतिनिधी नहीं है किंतु इन जैसे तटस्थ मनिषियों को जनहित एवं राष्ट्रहित के मुद्दो पर अनशन तथा भूख हडताल जैसे आंदोलन करने पड रहे है एवं समूचा शासनतंत्र तथा गुप्तचर संस्थायें इन आंदोलनों को असफल बनाने में सक्रिय है। यह लोकतंत्र की बहुत बडी विफलता है। अन्ना हजारे या बाबा रामदेव को तो देश व्यापी जनसमर्थन भी मिल रहा है । मेरा मानना  यह है कि आदर्श लोकतंत्र तो यह होता कि मेरे जैसा कोई साधारण एक व्यक्ति भी यदि देशहित का एक सुविचार रखता तो उसे सत्ता एवं विपक्ष का खुला समर्थन मिल सकता।
                इन अनुभवो से यह स्पष्ट होता है कि हमारी संवैधानिक व्यवस्था में सुधार की व्यापक संभावना है। दलगत राजनैतिक धु्व्रीकरण एवं पक्ष विपक्ष से उपर उठकर मुद्दों पर आम सहमति या बहुमत पर आधारित निर्णय ही विधायिका के निर्णय हो ऐसी सत्ताप्रणाली के विकास की जरूरत है। इसके लिए जनशिक्षा को बढावा देना तथा आम आदमी की राजनैतिक उदासीनता को तोडने की आवश्यकता दिखती है। जब ऐसी व्यवस्था लागू होगी तब किसी मुद्दे पर कोई 51 प्रतिशत या अधिक जनप्रतिनिधि एक साथ होगें तथा किसी अन्य मुद्दे पर कोई अन्य दूसरे 51 प्रतिशत से ज्यादा जनप्रतिनिधि , जिनमें से कुछ पिछले मुद्दे पर भले ही विरोधी रहे हो साथ होगें तथा दोनों ही मुद्दे बहुमत के कारण प्रभावी रूप से कानून बनेगें।
क्या हम निहित स्वार्थो से उपर उठकर ऐसी आदर्श व्यवस्था की दिशा में बढ सकते है एवं संविधान में इस तरह के संशोधन कर सकते है। यह खुली बहस का एवं व्यापक जनचर्चा का विषय है जिस पर अखबारो , स्कूल, कालेज, बार एसोसियेशन, व्यापारिक संघ, महिला मोर्चे, मजदूर संगठन आदि विभिन्न विभिन्न मंचो पर खुलकर बाते होने की जरूरत हैं।


(लेखक को विभिन्न सामाजिक विषयों पर लेखन के लिए राष्ट्रीय स्तर के अनेक पुरस्कार मिल चुके है)

18 जून, 2011

बिजली तंत्र पर...जबलपुर .में उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ल

बिजली तंत्र पर २००० करोड़ का अतिरिक्त भार

साभार नई दुनिया , जबलपुर .

७०० करो़ड़ रुपए विद्युत वितरण कंपनियों के पास अतिरिक्त रूप से आएंगे। इसे लेकर लोग महंगाई का हो-हल्ला मचा रहे हैं लेकिन केन्द्र जो दो हजार करो़ड़ रुपए का बोझ डाल रही है उसके लिए कोई विरोध नहीं कर रहा। श्री शुक्ल ने माना कि केन्द्र के रवैये से बिजली तंत्र का संचालन मुश्किल होगा लेकिन उसे बेहतर ढंग से काम करने के लिए प्रदेश सरकार मदद करेगी। उन्होंने कहा कि बिजली कंपनियों के पास ज्यादा पैसा आए इसके लिए उन्हें हर हाल में वितरण हानि १५ प्रतिशत से कम पर लाने हिदायत दी गई है। इसके साथ बकाया राशि को भी तेजी से वसूलने कहा गया है। उन्होंने कहा कि जल्द ही हम प्रदेश का बिजली उत्पादन ५००० मेगावाट ब़ढ़ाने जा रहे हैं। फ्रेंचाइजी के मुद्दे पर उनका कहना था कि काफी सोच विचार के बाद जनकल्याणकारी मॉडल पेश किया गया है। इसमें जनता के हित सभी प्रकार से सुरक्षित रहेंगे।

आराम की नौकरी नहीं- श्री शुक्ल ने कहा कि बिजली अधिकारियों, कर्मचारियों को भी बिजली कंपनियों की वित्तीय हालत देखते हुए पूरे समर्पण से काम करना होगा। वे अपनी नौकरी को आराम की नौकरी न समझें। यदि ४० से ६० प्रतिशत वितरण हानि रही तो न कंपनियों का भविष्य सुरक्षित रह पाएगा और न कर्मियों का। अत्यधिक घाटे में किसी भी संस्थान को बहुत ज्यादा दिन नहीं चलाया जा सकता।

फीडर सेपरेशन सुस्त- एक सवाल के जवाब में श्री शुक्ल ने बेबाकी से कहा कि फीडर विभक्तिरण परियोजना का काम बेहद सुस्त गति से चल रहा है। इसके लिए हमने अधिकारियों को क़ड़े शब्दों में चेता दिया है। इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए फंड उपलब्ध करा दिया गया है। बिडिंग हो चुकी है और काम करने वाली एजेंसियां भी आ चुकी हैं। ऐसे में अब हम और विलंब नहीं चाहते।

ट्रेडको रहेगी होल्डिंग कंपनी- श्री शुक्ल ने माना कि विद्युत मंडल के समाप्त होने के बाद पावर ट्रेडिंग कंपनी ट्रेडको को होल्डिंग कंपनी बनाने के लिए सभी एकमत हैं। इस पर निर्णय जल्द लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों के कंपनियों में हस्तांतरण और अन्य औपचारिकताओं को पूरा करने में लगभग तीन माह का समय लगेगा।

पेंशन फंड पर निर्णय जल्द- ऊर्जामंत्री ने माना कि प्रदेश सरकार बिजली कर्मचारियों का पेंशन फंड बनाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। नियामक आयोग से भी हमारी बातचीत हो चुकी है। अब हम इस निर्णय पर विचार कर रहे हैं कि प्रारंभिक तौर पर इसमें कितनी राशि डाली जाए और कैसे इसमें प्रतिवर्ष राशि आएगी? उन्होंने कहा कि मंडल समाप्त होने के बाद कर्मचारियों की सेवाशर्तें प्रभावित नहीं होंगी। कंपनियों में कर्मचारियों की जल्द पदोन्नति के रास्ते खुलेंगे।

10 जून, 2011

विद्युत वितरण कम्पनी की जन कल्याणकारी योजनायें

म.प्र.पूर्वी क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी की जन कल्याणकारी योजनायें

विवेक रंजन श्रीवास्तव
जनसंपर्क अधिकारी, म.प्र.पूर्वी क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी
ओ बी ११ , विद्युत मन्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर ४८२००८
मो ०९४२५८०६२५२
email vivek1959@yahoo.co.in


                 बिजली की अद्भुत आसमानी शक्ति को मनुष्य ने आकाश से धरती पर क्या उतारा , बिजली ने इंसान की समूची जीवन शैली ही बदल दी है .अब बिना बिजली के जीवन पंगु सा हो जाता है .भारत में विद्युत का इतिहास १९ वीं सदी से ही है , हमारे देश में कलकत्ता में पहली बार बिजली का सार्वजनिक उपयोग प्रकाश हेतु किया गया था .

आज बिजली के प्रकाश में रातें भी दिन में परिर्वतित सी हो गई . सोते जागते , रात दिन , प्रत्यक्ष या परोक्ष , हम सब आज बिजली पर आश्रित हैं . प्रकाश , ऊर्जा ,पीने के लिये व सिंचाई के लिये पानी ,जल शोधन हेतु , शीतलीकरण, या वातानुकूलन के लिये ,स्वास्थ्य सेवाओ हेतु , कम्प्यूटर व दूरसंचार सेवाओ हेतु , गति, मशीनों के लिये ईंधन ,प्रत्येक कार्य के लिये एक बटन दबाते ही ,बिजली अपना रूप बदलकर तुरंत हमारी सेवा में हाजिर हो जाती है .
रोटी ,कपडा व मकान जिस तरह जीवन के लिये आधारभूत आवश्यकतायें हैं , उसी तरह बिजली , पानी व संचार अर्थात सडक व कम्युनिकेशन देश के औद्योगिक विकास की मूलभूत इंफ्रास्ट्रक्चरल जरूरतें है . इन तीनों में भी बिजली की उपलब्धता आज सबसे महत्व पूर्ण है .क्योकि संचार व अन्य इंफ्रास्ट्रक्चरल सुविधायें भी अपरोक्ष रूप से बिजली पर ही आधारित हैं .
         बिजली बिल जमा करने मात्र से हम इसके दुरुपयोग करने के अधिकारी नहीं बन जाते , क्योंकि अब तक बिजली की दरें सब्सिडी आधारित हैं, न केवल सब्सिडाइज्ड दरों के कारण , वरन इसलिये भी क्योंकि ताप बिजली बनाने के लिये जो कोयला लगता है , उसके भंडार सीमित हैं , ताप विद्युत उत्पादन से जो प्रदूषण फैलता है वह पर्यावरण के लिये हानिकारक है , इसलिये बिजली बचाने का मतलब प्रकृति को बचाना भी है .
        वर्तमान परिदृश्य में , शहरों में अपेक्षाकृत घनी आबादी होने के कारण गांवो की अपेक्षा शहरों में अधिक विद्युत आपूर्ति बिजली कंपनियो द्वारा की जाने की विवशता होती है .पर इसके दुष्परिणाम स्वरूप गांवो से शहरो की ओर पलायन बढ़ रहा है . है अपना हिंदुस्तान कहाँ ? वह बसा हमारे गांवों में ....विकास का प्रकाश बिजली के तारो से होकर ही आता है . स्वर्णिम भारत की महत्वाकांक्षी परिकल्पना को मूर्त रूप देने के लिये गांवो में भी शहरो की ही तरह ग्रामीण क्षेत्रों के घरेलू उपभोक्ताओं को भी विद्युत प्रदाय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से प्रदेश में फीडर विभक्तिकरण की महत्वाकांक्षी समयबद्ध योजना लागू की गई है,  रिमोट मीटरिंग के लिये कंपनी को ई गवर्नेंस का राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिल चुका है , अन्य अनेको लोकहितकारी योजनायें कंपनी के द्वारा चलाई जा रही हैं ,ऐसी ही कुछ योजनाओ का संक्षिप्त विवरण आम उपभोक्ताओ की जानकारी हेतु प्रस्तुत है .

    राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजनाः-
         केन्द्र सरकार द्वारा प्रवर्तित राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना माह अप्रैल 2005 से मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी लिमिटेड क्षेत्रान्तर्गत  लागू की गई है ।  पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी अपने कार्य क्षेत्रान्तर्गत समस्त 20 जिलों हेतु रु. 969.394 करोड की उक्त योजना तेजी से क्रियान्वित कर रही है  .
        इस योजना में  केन्द्र सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युतीकरण कार्य हेतु, स्वीकृत लागत राशि का 90 प्रतिशत अनुदान एवं 10 प्रतिशत राशि ऋण के रुप में राज्य शासन को उपलब्ध कराये जाने का प्रावधान है । दसवीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत  जबलपुर, सिवनी, दमोह, छिंदवाड़ा जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य योग्य 43 अविद्युतीकृत ग्रामों एवं 5945 विद्युतीकृत ग्रामों के 300 से अधिक आबादी वाले अविद्युतीकृत क्षेत्र एवं मजरे/टोलों के विद्युतीकरण एवं 11 वीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत जिला कटनी, नरसिंहपुर, मण्डला, डिण्डौरी, बालाघाट, रीवा, सतना, सीधी (सिंगरौली सहित), शहडोल, अनूपपुर, उमरिया, सागर, छतरपुर, टीकमगढ़ एवं पन्ना के ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य योग्य 436 अविद्युतीकृत ग्रामों, 15971 विद्युतीकृत ग्रामों के 100 से अधिक आबादी वाले अविद्युतीकृत क्षेत्र/मजरे/टोलों के विद्युतीकरण के कार्य किये जाने एवं गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले 985068 सभी श्रेणी के हितग्राहियों को निःशुल्क एकबत्ती कनेक्शन प्रदान किये जाने का प्रावधान  है .इस तरह सब के लिये सतत बिजली आपूर्ती के अंतिम लक्ष्य को न्यूनतम संचारण हानि के साथ प्राप्त करने हेतु इस योजना को तकनीकी विशेषज्ञता के साथ लागू करने का महत्वपूर्ण कार्य कंपनी द्वारा किया जा रहा है .
        गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले उपभोक्ता संबंधित वितरण केन्द्र कार्याल्य में सम्पर्क कर योजना के अंतर्गत निशुल्क कनेक्शन प्राप्त कर सकते हैं ।

    स्थाई पम्प कनेक्शन योजना:-
        कृषि को लाभ का धंधा बनाने के राज्य शासन के संकल्प के दृष्टिगत तथा वितरण प्रणाली को सुव्यवस्थित रखने हेतु कृषि के लिए स्थायी विद्युत पम्प कनेक्शन दिया जाना महत्वपूर्ण है . प्रत्येक फसल में  सिंचाई के समय अस्थाई विद्युत कनेक्शन लेने की कठिनाई से किसानो को हमेशा के लिये  मुक्त करने के उद्देश्य से , शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों हेतु मध्यप्रदेश शासन द्वारा दिनांक 1.4.11 से  ‘‘कृषकों को स्थायी विद्युत पम्प कनेक्शन प्रदान करने हेतु अनुदान योजना‘‘ नाम से यह योजना लागू की गई है । इस योजना के द्वारा कृषकों को  स्थायी पम्प कनेक्शन लेने की प्रक्रिया को सरल बनाया गया है तथा इस कार्य में लगने वाली कुल राशि का एक बड़ा अंशदान राज्य शासन द्वारा अनुदान के रुप में दिया जाना प्रस्तावित  है।
        यह योजना सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में 1 अप्रैल 2011 से वर्ष 2011-2012 के लिए लागू है । राज्य शासन आवश्यकतानुसार योजना की अवधि में वृद्धि कर   सकेगा । योजनांतर्गत लघु एवं सीमान्त किसानों को रु. 5000/- प्रति हार्स पावर तथा अन्य  किसानों को रु. 8000/- प्रति हार्स पावर की दर से भुगतान करना  होगा । प्रत्येक उपभोक्ता के लिए अधिकतम लागत राशि 1.50 लाख की शेष लागत राशि शासन द्वारा अनुदान स्वरूप प्रदान की जाएगी । योजनांतर्गत किसान संबंधित वितरण केन्द्र में आवेदन कर तथा उपरोक्तानुसार राशि जमा करके , वांछित हार्सपावर के स्थायी पम्प कनेक्शन प्राप्त कर सकते हैं ।
                      

 स्वयं का नया ट्रांसफार्मर योजना:-
        कम्पनी द्वारा पूर्व में लागू स्वयं के ट्रांसफार्मर योजना के स्वरुप में ऊर्जा विभाग, मध्यप्रदेश शासन द्वारा दिये गये निर्देशानुसार संशोधन कर नवीन स्वयं का ट्रांसफार्मर योजना लागू की गई है । योजनांतर्गत कृषक स्वयं कृषि कार्य हेतु अपना ट्रांसफार्मर लगा सकते हैं । कृषक संबंधित वितरण केन्द्र में आवेदन देकर योजना का लाभ उठा सकते हैं ।इस तरह किसान उपभोक्ता व्यक्तिगत या समूह के रूप में स्वयं के वितरण ट्रांस्फारमर स्थापित करवा कर अपेक्षाकृत निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित कर सकते हैं .
      
                                      
आदिवासी उपयोजना एवं विशेष घटक योजना:-
        राज्य शासन द्वारा  आदिवासी उपयोजना तथा विशेष घटक योजना के अंतर्गत प्रतिवर्ष गांवो के मजरे/टोलों/अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के कृषकों को उक्त योजना में पम्प कनेक्शन के विद्युतीकरण/एकबत्ती कनेक्शन हेतु जिला स्तर पर राशि उपलब्ध कराई जाती है । इन योजनाओं का क्रियान्वयन जिला स्तर पर गठित जिला क्रय समिति द्वारा कराया जाता है .जिला क्रय समितियो के  अध्यक्ष जिले के कलेक्टर होते हैं ,एवं जनप्रतिनिधि उसके सदस्य होते हैं ,  इस तरह विद्युतीकरण के द्वारा पिछड़े हुये लोगो के विकास के  राष्ट्रीय महायज्ञ में स्थानीय प्रतिनिधियो की भागीदारी तथा जन आवश्यकताओ की पूर्ति इस योजना द्वारा सुनिश्चित हो पाती है .



स्वैच्छिक संबद्ध भार घोषणा योजना

        दिन प्रतिदिन विद्युत उपकरणो से बढ़ती सुविधाओ के कारण लगभग प्रायः  उपभोक्ताओ द्वारा समय के साथ अपने कनेक्शन लेते समय स्वीकृत कराये गये भार या लोड से अधिक के विद्युत उपकरण  स्वतः जोड़ लिये जाते हैं . इस तरह अनजाने में ही उपभोक्ता न केवल विद्युत वितरण प्रणाली पर अतिरिक्त भार डालता है एवं वितरण ट्रांस्फारमर के ओवरलोड होने का कारण बनता है .यह कृत्य विद्युत अधिनियम की धारा १२६ के अंतर्गत अपराध की श्रेणि में आता है . अतः उपभोक्ता जागरूखता की दिशा में पहल करते हुये कंपनी ने ३० सितंबर २०११ तक उपभोक्ता द्वारा स्वयं संबद्ध भार की घोषणा करने पर कोई पेनाल्टी न लगाने की यह योजना लागू की है , जिसका व्यापक प्रचार प्रसार किया जा रहा है .

म.प्र.लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम 2010 -
        इस नियम के अंतर्गत ऊर्जा विभाग से संबंधित 6 सेवाओं यथा निम्नदाब के व्यक्तिगत नवीन कनेक्शन के लिये मांग पत्र प्रदान करना , जहां ऐसा कनेक्शन वर्तमान नेटवर्क से संभव है, मांग पत्र अनुसार राशि जमा करने के बाद वर्तमान नेटवर्क से निम्नदाब नवीन कनेक्शन प्रदान करना, जहॉ वर्तमान अधोसंरचना में विस्तार की आवश्यकता न हो वहॉ 10 कि.वा. तक अस्थाई कनेक्शन प्रदान करना, जहॉ वर्तमान अधोसरंचना में विस्तार की आवश्यकता न हो वहॉ भारवृद्धि के प्रकरणों में मांग पत्र जारी करना, जहॉ वर्तमान अधोसंरचना में विस्तार की आवश्यकता न हो वहॉ मांगपत्र अनुसार राशि जमा करने के उपरांत भारवृद्धि करना तथा निम्नदाब उपभोक्ताओं के मीटर बंद होने या तेज चलने की शिकायत पर जॉच कराना एवं मीटर खराब पाये जाने पर सुधारना या बदलना इत्यादि की निश्चित समय-सीमा निर्धारित कर सेवायें प्रदान की जा रही है.

ए टी पी से करें कभी भी कहीं भी , अपनी विद्युत देनदारियों का भुगतान
            म.प्र.पूर्वी क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी , जबलपुर ने म.प्र. में सर्वप्रथम यह उपभोक्ता सुविधा जुटाकर महत्वपूर्ण कार्य किया है . कंपनी के सी एम डी श्री पंकज अग्रवाल आई ए एस महोदय ने स्पष्ट सोच सामने रखी .उनके अनुसार "जब उपभोक्ता बिजली बिल जमा करना चाहता है , तो उसे सम्मान पूर्वक , साफसुथरे वातावरण में बिना लम्बी लाइन में लगे अपने बिल जमा करने का अवसर दिया जाना जरूरी है इससे  कंपनी के राजस्व में वृद्धि होगी ."  एम पी आनलाइन के माध्यम से भी बिल जमा करने की सेवा प्रारंभ की गई . पर सबसे प्रभावी व क्रांतिकारी कदम के रूप में  ए टी पी मशीनो की स्थापना की गई .  ए टी पी मशीन लगाने वाली कुछ कंपनियो में से एक एस पी एम एल टैक्नालाजी बैंगलोर के साथ करार किया गया व उक्त संस्था ने बैंको की एटीएम मशीनो की ही तरह जगह जगह एटीपी मशीनें स्थापित की हैं जिनमें कंप्यूटर साफ्टवेयर के माध्यम से टच स्क्रीन विंडो के द्वारा २४ घंटे , ३६५ दिन नगद , चैक , ड्राफ्ट , क्रैडिट कार्ड , या डेबिट कार्ड के जरिये बिजली बिल भुगतान की सहज सुविधा सुलभ कराई गई है .एटीपी मशीन का उपयोग बिना पढ़े लिखे उपभोक्ता भी कर सकें  इसके लिये प्रत्येक एटीपी पर एक सहायक रखा गया है , जो मशीन से बिल जमाकर रसीद देने में उपभोक्ता की सहायता करता है व मशीन की सुरक्षा की जबाबदारी भी उठाता है . ए टी पी मशीनो की सफलता देखते हुये नगर नगर में इनका सतत विस्तार किया जा रहा है .

        उक्त विभिन्न  योजनाओं का लाभ  प्राप्त किये जाने हेतु विस्तृत जानकारी प्रत्येक जिला स्तर/तहसील स्तर/विकासखण्ड स्तर/ग्रामीण क्षेत्र में विद्यमान विद्युत वितरण केन्द्रों के कार्यालयों के संबंधित अधिकारियों से प्राप्त कर लाभ प्राप्त किया जा सकता है , प्रत्येक बिजली के बिल में क्षेत्रीय विद्युत प्रभारी के संपर्क टेलिफोन व मोबाइल नम्बर प्रकाशित करने की पारदर्शी प्रणाली कंपनी में लागू की गई है . विद्युत कर्मचारी व अधिकारी आम उपभोक्ता की सेवा हेतु फ्यूजआफ काल सेंटर्स पर सप्ताह के सातो दिन चौबीसो घंटे सुलभ रहते हैं , तथा किसी भी आकस्मिकता पर रात या दिन छुट्टी या कार्यदिवस की सीमाओ से परे उठकर निरंतर विद्युत आपूर्ति हेतु सक्रिय रहते हैं . जिन फीडर्स पर लगातार लाइनलास १५ प्रतिशत से कम रिकार्ड किया जावेगा वहां निर्बाध २४ घंटे विद्युत आपुर्ति किये जाने हेतु कंपनी तत्पर है . अतः अब समय आ गया है कि उपभोक्ता भी जागरुखता दिखायें और कंपनी के साथ कदम से कदम मिलाकर न केवल कल्याणकारी योजनाओ का लाभ उठावें वरन बिजली बिलो का सुनिश्चित समय पर भुगतान करके अपने उपभोक्ता दायित्वो का निर्वहन करते हुये सबके लिये सतत बिजली की परिकल्पना को साकार करने में शासन का सहयोग करें . 



15 मई, 2011

नैसर्गिक न्याय के लिये इनोसेंट नागरिको की ओर से


नेशनल वेस्ट है यह तोड़ फोड़

कल्पना श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
९४२५८०६२५२


        भोपाल में मीनाल माल ढ़हा कर सरकार बेहद खुश है , सरकारी कर्मचारी जो कुछ समय पहले तक ऐसे निर्माण करने की अनुमति देने के लिये बिल्डरों से गठजोड़ करके काला धन बटोर रहे थे , अब ऐसी सम्पत्तियो को चिन्हित न करने के एवज में मोटी रकम बटोर रहे हैं .
        लोगों की गाढ़ी कमाई , उनकी आजीविका , अनुमति देने वाली एजेंसियो , प्रापर्टी सही है या नही इसकी सचाई की जानकारी के बिना  , मोटी फीस वसूल कर वास्तविक कीमत से कम कीमत की रजिस्ट्री करने वाले  रजिस्ट्रार कार्यालय के अमले ,बिना किसी जिम्मेदारी के सर्च रिपोर्ट बनवाकर फाइनेंस करने वाले बैंको की कार्य प्रणाली , और व्यक्तिगत रंजिश के चलते , राजनैतिक प्रभाव का उपयोग कर आहें बटोरने वाले मंत्रियो पर काफी कुछ लिखा जा रहा है .सरकार की इस अचानक कार्यवाही के पक्ष विपक्ष में बहुत कुछ लिखा जा रहा है . जिनका व्यक्तिगत कुछ बिगड़ा नही है , वे प्रसन्न है .निरीह आम जनता को उजाड़ने में सरकारी अमले को पैशाचिक सुख की प्राप्ति हो रही है .
        मै एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत के "रामभरोसे " जी रहे आम नागरिक होने के नाते इस समूचे घटनाक्रम को एक दूसरे दृष्टिकोण से देखना चाहती हूं . एक आम आदमी जिसे मकान लेना है उसके पास खरीदी जा रही प्रापर्टी की कानूनी वैद्यता जानने के लिये बिल्डर द्वारा दिखाये जा रहे सरकारी विभागों से  पास नक्शे एवं बाजू में किसी अन्य के द्वारा खरीदे गये वैसे ही मकान की रजिस्ट्री ,बैंक की सर्च रिपोर्ट  तथा बिल्डर के निर्माण की गुणवत्ता के सिवाये और क्या होता है ? इस सबके बाद जब वह मकान खरीद कर दसो वर्षों से निश्चिंत वहां रह रहा होता है , नगर निगम उससे प्रसन्नता पूर्वक सालाना टेक्स वसूल रही होती है , टैक्स जमा करने में किंचित विलंब पर पैनाल्टी भी लगा रही होती है , उसे बिजली , पानी के कनेक्शन आदि जैसी प्राथमिक नागरिक सुविधायें मिल रही होती हैं तब अचानक एक सुबह कोई पटवारी उसके घर को अवैद्य निर्माण चिंहित कर दे , इतना ही नही सरकार अपनी वाहवाही और रुतबा बनाने के लिये उसे वह दुकान या मकान खाळी करने के लिये एक घंटे की मोहलत तक न दे तो इसे क्या कहा जाना चाहिये ? क्या इतने पर भी यह मानना चाहिये कि हम लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं ?
        अवैद्य निर्माण को प्रोत्साहित भी सरकारो ने ही किया , कभी राजनैतिक संरक्षण देकर तो कभी पट्टे बांटकर , किसी के साथ  कुछ तो कभी किसी और के साथ कुछ अन्य नीति आखिर क्या बताती है ? जबलपुर में अतिक्रमण विरोधी कार्यवाही में बालसागर में हजारो गरीबों के झोपड़े उजाड़ दिये गये , इस कार्यवाही में दो लोगो की मौत भी हो गई . क्या यह सही नही है कि ये अतिक्रमण करवाते समय नेताजी ने , तहसीलदार जी ने और लोकल गुंडो ने इन गरीबों का भरपूर दोहन किया था ?
        जो लोग इस आनन फानन में की गई तोड़फोड़ की प्रशंसा कर रहे हैं मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि मेरे घर में एक चिड़िया ने एक फोटो फ्रेम के पीछे घोंसला बना लिया था , मैं छोटी था , घोंसले के तिनके चिड़िया की आवाजाही से गिरते थे , उस कचरे से बचने के लिये जब मैने वह घोसला हटाना चाहा तो उस घोंसले तक को हटाने के लिये,  चिड़िया के बच्चो को बड़ा होकर उड़ जाने तक का समय देने की हिदायत मेरे पिताजी ने मुझे दी थी . संवेदनशीलता के इस स्तर पर जी रहे मुझ जैसो को सरकार की इस कार्यवाही की आलोचना का नैतिक आधिकार है ना ? चिड़िया के घोसले से फैल रहे कचरे से तो हमारा घर सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा था , पर मेरा प्रश्न है कि मीनाल माल या इस जैसी अन्य तोड़ फोड़ से खाली जमीन का सरकार ने उससे बेहतर क्या उपयोग करके दिखाया  है ? पर्यावरण की रक्षा में बड़े बड़े कानून बनाने वाले क्या मुझे यह बतायेंगे कि तोड़े गये निर्माण में लगा श्रम , सीमेंट , लोहा , अन्य निर्माण सामग्री नेशनल वेस्ट नही है ? उस सीमेंट , कांच व अन्य सामग्री के निर्माण से हुये प्रदूषण के एवज में समाज को क्या मिला ? इस क्रिमिनल वेस्ट का जबाबदार आखिर कौन है ? इगोइस्ट मंत्री जी ? नाम कमाने की इच्छा से प्रेरित आई ए एस अधिकारी ? क्या ऐसी कार्यवाहियो की अनुमति देने के लिये एक डिप्टी कलेक्टर स्तर के अधिकारी के हस्ताक्षर पर्याप्त हैं ? यह सब चिंतन और मनन के मुद्दे हैं .
        मैं नही कहती कि अवैद्य निर्माण को प्रोत्साहन दिया जावे . सरकार ने यदि उन लोगो पर कड़ी कार्यवाही की होती  , जिन्होने ऐसे निर्माणो की अनुमति दी थी तो भी भविष्य में ऐसे निर्माण रुक सकते थे . रजिस्ट्रार कार्यालय बहुत बड़े बड़े विज्ञापन छापता है जिनमें सम्पत्ति के मालिकाना हक के लिये वैद्य रजिस्ट्री होना जरूरी बताया जाता है , रजिस्ट्री से प्राप्त फीस सरकारी राजस्व का बहुत बड़ा अंश होता है , तो क्या इस विभाग को इतना सक्षम बनाना जरूरी नही है कि गलत संपत्तियो की रजिस्ट्री न हो सके , और यदि एक बार रजिस्ट्री हो जावे तो उसे कानूनी वैद्यता हासिल हो . आखिर हम सरकार क्यो चुनते हैं ,सरकार से सुरक्षा पाने के लिये या  हमारे ही घरो को तोड़ने के लिये ?
        मैं न तो कोई कानूनविद् हूं और न ही किसी राजनैतिक पार्टी की प्रतिनिधि . मैं नैसर्गिक न्याय के लिये इनोसेंट नागरिको की ओर से पूरी जबाबदारी से लिखना चाहती हूं कि यदि मीनाल माल एवं उस जैसी अन्य तोड़फोड़ की जगह उससे बेहतर कोई प्रोजेक्ट सरकार जनता के सामने नही ला पाती है तो यह तोड़फोड़ शर्मनाक है .क्रिमिनल वेस्ट है . मीनाल रेजीडेंसी देश की सर्वोत्तम कालोनियो में से एक है यदि इस तरह की कार्यवाही वहां हो सकती है तो भला कौन इंटरप्रेनर प्रदेश में निवेश करने आयेगा ? यह कार्यवाही निवेशको को प्रदेश में बुलाने के लुभावने सरकारी वादो के नितांत विपरीत है . आम आदमी से धोखा है , इसका जो खामियाजा सरकार अगले चुनावो में भुगतेगी वह तो बाद की बात है , पर आज कानून क्या कर रहा है ? क्या हम इतने नपुंसक समाज के निवासी है कि एक मंत्री अपने व्यक्तिगत वैमनस्य के लिये आम लोगो को घंटे भर में उजाड़ सकता है , और सब मूक दर्शक बने रहेंगे ? क्या  इन असहाय लोगो के साथ अन्याय होता रहने दिया जावे क्योकि वे संख्या में कम हैं , मजबूर हैं और व्यवस्था न होने के चलते अज्ञानता से वे इन मकानो के मालिक हैं . ऐसे इंनोसेंट लोगो पर कार्यवाही करके सरकार कौन सी मर्दानगी दिखा रही है , और क्या इससे यह प्रमाणित नही होता है कि यह सब दुर्भावना पूर्ण है , जब बिल्डर से सौदा नही बना तो तोड़फोड़ शुरू , अधिकारो के ऐसे दुष्प्रयोग जनतांत्रिक देश में असहनीय हैं .
दुष्यंत कुमार की पंक्तियां हैं
लोग जिंदगी लगा देते हैं एक घर बसाने में
उन्हें पल भर भी नही लगता बस्तियां जलाने में
यद्यपि इन पंक्तियो का संदर्भ भिन्न है , पर फिर भी यह ऐसी सरकारी नादिरशाही की दृष्टि से प्रासंगिक ही हैं  .सरकार से पुनः प्रार्थना है कि व्यापक लोकहित तथा राष्ट्र हित में उदारता से विचार कर लोगो को बेघर न करें , बिल्डर पर जो भी पेनाल्टी लगानी हो वह लगाकर यदि कोई अच्छा निर्माण कतिपय रूप से अवैधानिक भी है तो उसका नियमतीकरण करने की जरूरत है .



लेखिका को सामाजिक विषयों पर लेखन हेतु अनेक पुरुस्कार मिल चुके हैं